जीवन के रंग
विश्व के चित्रपट पर देखते हैं नित्य चित्र इस जीवन का।
जो लगता है चलचित्र सा, देता है आभास जैसे,
हो किस्सा किसी और का, अनजान से राहगीर का ।
जिसको नहीं हम जानते, अपना नहीं हम मानते ।
जाने क्यों न वैसी लगती हमें उसकी कथा,
जिसकी थी हमें अपेक्षा, समझी थी जिसकी व्यथा ।
जो लगता है चलचित्र सा, देता है आभास जैसे,
हो किस्सा किसी और का, अनजान से राहगीर का ।
जिसको नहीं हम जानते, अपना नहीं हम मानते ।
जाने क्यों न वैसी लगती हमें उसकी कथा,
जिसकी थी हमें अपेक्षा, समझी थी जिसकी व्यथा ।
पर सहसा नेत्रपट खुल जाते हैं ।
उसके अनगिन पात्रों के बीच कहीं ख़ुद को ही खड़ा पाते हैं !
वेदना से भर कर कुछ सहम से हम जाते हैं !
फिर उसमें दिखते हुए किसी भी भग्न-हृदय मानव की,
करके अवहेलना उस पर हँस नहीं हम पाते हैं !
उसके अनगिन पात्रों के बीच कहीं ख़ुद को ही खड़ा पाते हैं !
वेदना से भर कर कुछ सहम से हम जाते हैं !
फिर उसमें दिखते हुए किसी भी भग्न-हृदय मानव की,
करके अवहेलना उस पर हँस नहीं हम पाते हैं !
उस चल-चित्र में जीवन के विभिन्न रंग दिख जाते हैं ।
हर रंग का कोई निशाँ हम अपने वसनों पर पाते हैं !
इन रंगों के भ्रमरजाल में कुछ ऐसे खो जाते हैं ।
के अपने-पराए का भान भूल सब रंगों में समा जाते हैं ।
हर रंग का कोई निशाँ हम अपने वसनों पर पाते हैं !
इन रंगों के भ्रमरजाल में कुछ ऐसे खो जाते हैं ।
के अपने-पराए का भान भूल सब रंगों में समा जाते हैं ।
ऐसे ही फँस कर भ्रमित हो संपूर्ण जीवन बिताते हैं ।
जग-कर्ता की इस माया को समझ नहीं हम पाते हैं !
गर कभी भाग्य चमक उठता औ ज्ञान प्रकाश को पाते है ।
जाने क्यों कर अवहेलना, हो मौन कहीं सो जाते हैं ।
जग-कर्ता की इस माया को समझ नहीं हम पाते हैं !
गर कभी भाग्य चमक उठता औ ज्ञान प्रकाश को पाते है ।
जाने क्यों कर अवहेलना, हो मौन कहीं सो जाते हैं ।
जब जगते हैं तो होता है अपनी भूलों का आभास ।
पुन: एक मौका पाने का करने लगते हैं प्रयास ।
पर भूल-सुधार का मौका सबको नहीं मिल पाता है ।
और यूँ ही पछताता मानव छोड़ जगत को जाता है ।
पुन: एक मौका पाने का करने लगते हैं प्रयास ।
पर भूल-सुधार का मौका सबको नहीं मिल पाता है ।
और यूँ ही पछताता मानव छोड़ जगत को जाता है ।
विदा होता इस जगती से, पुन: प्रकट होने की आस में ।
अगली बार सतर्क रहने के मन में बँधे विश्वास में ।
पर "अगली बार" कब होगी, कैसी होगी ?
यह भी तो है नहीं ज्ञात के होगी भी या ना होगी ?
अगली बार सतर्क रहने के मन में बँधे विश्वास में ।
पर "अगली बार" कब होगी, कैसी होगी ?
यह भी तो है नहीं ज्ञात के होगी भी या ना होगी ?
ज्ञात नहीं है यहाँ किसी को, कोई नहीं है जानता ।
फिरभी जाने क्यों मानव, ना सत्य को पहचानता ।
भ्रमित सा उसका मानस, माया को सत्य मानता !
या शायद सब जान कर भी सत्य से दूर भागता !
अंत:करण की आवाज़ को सुनकर भी नहीं जागता ।
फिरभी जाने क्यों मानव, ना सत्य को पहचानता ।
भ्रमित सा उसका मानस, माया को सत्य मानता !
या शायद सब जान कर भी सत्य से दूर भागता !
अंत:करण की आवाज़ को सुनकर भी नहीं जागता ।
- सरस्वती जोशी
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