Sunday, February 22, 2015

उपहार

उपहार
आज चाहते तुमको देना कोई सुंदर सा उपहार ।
यही ढूँढने निकले थे और देख लिया सारा बाज़ार । 
यूँ तो कितनी ही चीजें थीं लगती भी थीं सब अनमोल ।
छाँट रहे थे लोग उन्हें पर अपने नोटों से कुछ तोल ।
हमको उनमें छिपा दिखा कुछ उनके नोटों का अभिमान ।
और लगीं वे सौगातें कुछ फीकी-फीकी औ बेजान ।
तुमको देने लायक हो कुछ ऐसा कुछ भी नहीं मिला ।
हँस करके रख पाएँ आगे हो कुछ ऐसा खिला-खिला ।
जब घर लौटे तो मन भीतर से कुछ थोड़ा हुआ उदास ।
क्या भेजें, कैसे कुछ पाएँ, मिल जाता हमको कुछ काश ।
यही सोचते अपने में ही गहराई में डूब गये ।
और देख कर चमक किसी की विस्मित से हम चौंक गये ।
भीतर कहीं बचे थे बाकी थोड़े से मुस्कानों के कण ।
क्यों न भेज दूँ इन्हें बीन कर लगा पूछने मेरा यह मन ।
पड़े रह गये अगर यहीं तो कभी खार से भर जाएँगे ।
और बनेंगे सभी व्यर्थ ये किसी काम ना आएँगे ।
पर कितने थोड़े हैं ये तो सोच यही होता संकोच ।
पर गर तुम अपने हो तो क्या देखोगे तुम इनका बोझ ?
भेज रहे हैं हम तुमको यह अपना छोटा सा उपहार ।
मान हमें अपना तुम देखो कर लेना इसको स्वीकार !
- सरस्वती जोशी

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