माँ की ममता
(हर उस माँ को समर्पित जो अपने पुत्र के स्नेह से वंचित हो, उसके लिये तरसती हो ! यह वैसे पाश्चात्य सभ्यता की समस्या अधिक है किंतु अब आधुनिकीकरण के सम्मोहन में फँसे बेटे भारत में भी अधिकाधिक इस ओर अग्रसर होने लगे हैं ! भारत में नित नये वृद्धाश्रम व विधवा-आश्रम कम से कम इसी ओर संकेत करते हैं ! काश मेरा अनुमान गलत निकले ! पता नहीं ! पर मुझे ऐसा आभास हुआ इसीलिये यह कविता लिखी है ! मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि यह कविता सदा चर्चित रहे, कभी इसके लिये "सही कहा है", सुनने को न मिले ।)
(हर उस माँ को समर्पित जो अपने पुत्र के स्नेह से वंचित हो, उसके लिये तरसती हो ! यह वैसे पाश्चात्य सभ्यता की समस्या अधिक है किंतु अब आधुनिकीकरण के सम्मोहन में फँसे बेटे भारत में भी अधिकाधिक इस ओर अग्रसर होने लगे हैं ! भारत में नित नये वृद्धाश्रम व विधवा-आश्रम कम से कम इसी ओर संकेत करते हैं ! काश मेरा अनुमान गलत निकले ! पता नहीं ! पर मुझे ऐसा आभास हुआ इसीलिये यह कविता लिखी है ! मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि यह कविता सदा चर्चित रहे, कभी इसके लिये "सही कहा है", सुनने को न मिले ।)
ओ मेरे खोये सुहाग की शोभा ! मेरे उपवन के वसंत !
क्यों तुमने झटके से यूँ कर दिया इतनी दूर कि फिर मिल भी न पाएँ !
कि हम सागर में तैरते-तैरते ही डूब जाएँ, पर फासले कम न कर पाएँ !
हमने सदा किया है तुमको सच्चे दिल से इतना प्यार !
तुम्हारे पिता से किये वादे याद रख, रचा इक सपनों का संसार !
क्यों तुमने झटके से यूँ कर दिया इतनी दूर कि फिर मिल भी न पाएँ !
कि हम सागर में तैरते-तैरते ही डूब जाएँ, पर फासले कम न कर पाएँ !
हमने सदा किया है तुमको सच्चे दिल से इतना प्यार !
तुम्हारे पिता से किये वादे याद रख, रचा इक सपनों का संसार !
तुम में ही मगन हो भूल गये, अपनी व्यथाओं का सारा भार !
सोचने लगे कि तुम ही हो, हमारे तप का सारा सार !
रहोगे सदा बन कर हमारे जीवन का एक सुदृढ़ आधार !
थाम कर के हाथ हमारा हर लोगे जीवन का भार ।
सोचने लगे कि तुम ही हो, हमारे तप का सारा सार !
रहोगे सदा बन कर हमारे जीवन का एक सुदृढ़ आधार !
थाम कर के हाथ हमारा हर लोगे जीवन का भार ।
लिया था तुमसे हमने मित्र का इक निश्छल सा नाता भी जोड़ !
पर आज तुमने जाने क्यों सहसा, दिये यूँ बंधन सारे तोड़ !
रुख खींच कर अचानक चल दिये तुम हमसे मुँह मोड़ ।
बेरुखी दिखा अनायास ही अचानक हमारा हाथ छोड़ !
पर आज तुमने जाने क्यों सहसा, दिये यूँ बंधन सारे तोड़ !
रुख खींच कर अचानक चल दिये तुम हमसे मुँह मोड़ ।
बेरुखी दिखा अनायास ही अचानक हमारा हाथ छोड़ !
वे प्यारी सी भोली यादें, क्या थीं केवल भ्रम की लड़ियाँ ?
क्या केवल स्वप्न-जाल सी थीं वे हँसती-मुसकाती घड़ियाँ ।
अबतो बचा बस पास हमारे, भग्न अवशेषों का इक ढेर !
वे साथ गुज़रे लम्हे हमारे, थे क्या केवल माया के फेर ?
क्या केवल स्वप्न-जाल सी थीं वे हँसती-मुसकाती घड़ियाँ ।
अबतो बचा बस पास हमारे, भग्न अवशेषों का इक ढेर !
वे साथ गुज़रे लम्हे हमारे, थे क्या केवल माया के फेर ?
क्यूँ दिखा दिया कोई न अपना, थी सब कल्पना बेकार !
सोच कर देखो एक बार, क्या वह सब कुछ था नि:सार ?
हम तो जुड़े थे तुम्हीं से, किसके भरोसे अब रहें ?
तुमने हमें ठुकरा दिया क्यों ? यह यातना कैसे सहें ?
सोच कर देखो एक बार, क्या वह सब कुछ था नि:सार ?
हम तो जुड़े थे तुम्हीं से, किसके भरोसे अब रहें ?
तुमने हमें ठुकरा दिया क्यों ? यह यातना कैसे सहें ?
तुम हमारी प्रिय संतान हो, हमारे जीवन का अरमान हो !
तुम्हीं हमारा मान-सम्मान हो, हमारे इस कुल की शान हो !
या तो तुम हमारे उर में छिपे स्नेह को पूरा समझ पाते नहीं !
या नियति के फेर से, अनजान से बन, हमारी परीक्षा से हिचकिचाते नहीं ।
तुम्हीं हमारा मान-सम्मान हो, हमारे इस कुल की शान हो !
या तो तुम हमारे उर में छिपे स्नेह को पूरा समझ पाते नहीं !
या नियति के फेर से, अनजान से बन, हमारी परीक्षा से हिचकिचाते नहीं ।
याद आते बार-बार वे शब्द, जो सदा तुम्हीं कहते रहे :
"सच्चे हितैषी को आवश्यकता नहीं कि वह करे अपना स्नेह साबित ।
उसे ज़रूरत नहीं कि वह बार-बार, करे अपनी हितैषिता प्रचारित ।
उसकी वाणी में, हाव-भाव में, सदा झलकती है भावना कल्याणकारी ।
उससे उठता सौरभ स्वयं ही, समझा देता जब आती समझाने की बारी ।"
"सच्चे हितैषी को आवश्यकता नहीं कि वह करे अपना स्नेह साबित ।
उसे ज़रूरत नहीं कि वह बार-बार, करे अपनी हितैषिता प्रचारित ।
उसकी वाणी में, हाव-भाव में, सदा झलकती है भावना कल्याणकारी ।
उससे उठता सौरभ स्वयं ही, समझा देता जब आती समझाने की बारी ।"
पर क्या यह सब है केवल मात्र भ्रम ? क्या संसार का सत्य इतना निर्मम ?
नहीं ! यह संभव नहीं ! कहते हैं : "सत्य तो स्वयं भगवान होता है !"
"साँच को आँच नहीं !" हर ग्रंथ बार-बार यही कहता है ।
तो सत्य एक दिन अवश्य सामने आएगा, अपना दिव्य प्रकाश फैलाएगा ।
उसकी ज्योति के समक्ष तुम्हारा भ्रम का अंधेरा मिट जाएगा ।
नहीं ! यह संभव नहीं ! कहते हैं : "सत्य तो स्वयं भगवान होता है !"
"साँच को आँच नहीं !" हर ग्रंथ बार-बार यही कहता है ।
तो सत्य एक दिन अवश्य सामने आएगा, अपना दिव्य प्रकाश फैलाएगा ।
उसकी ज्योति के समक्ष तुम्हारा भ्रम का अंधेरा मिट जाएगा ।
पर हाँ ! लगता है, जब वह घड़ी पास हमारे आएगी ।
नियति निर्णय ले लेगी औ फिर देर बहुत हो जाएगी ।
हमारा स्नेह विकल टूटा उर इतनी पीड़ा ना सह पाएगा ।
यह पंछी उड़कर शायद कहीं दूर जा कर बस जाएगा ।
नियति निर्णय ले लेगी औ फिर देर बहुत हो जाएगी ।
हमारा स्नेह विकल टूटा उर इतनी पीड़ा ना सह पाएगा ।
यह पंछी उड़कर शायद कहीं दूर जा कर बस जाएगा ।
एक अनजान सूने से जगत में, जहाँ से देख तो तुमको पाएगा ।
गर दिखा उदास चेहरा तुम्हारा, तो आँसू भी बहाएगा ।
पर वह फिर से हाथ पकड़ कर,मदद नहीं कर पाएगा ।
दूर कहीं से बेबस सा, बस पीड़ा में घुलता रह जाएगा ।
गर दिखा उदास चेहरा तुम्हारा, तो आँसू भी बहाएगा ।
पर वह फिर से हाथ पकड़ कर,मदद नहीं कर पाएगा ।
दूर कहीं से बेबस सा, बस पीड़ा में घुलता रह जाएगा ।
हमें ज्ञात है उस दिन तुम्हारा निश्छल सा सरल हृदय पिघल जाएगा ।
छोड़ अपनी सारी कटुता को, फिर मूल रूप में आ जाएगा ।
हमें गलत समझने की भूल पर, अवश्य ही बार-बार पछतायगा ।
लेकिन जो तुमने खोया होगा, वह फिर न पाया जायेगा ।
छोड़ अपनी सारी कटुता को, फिर मूल रूप में आ जाएगा ।
हमें गलत समझने की भूल पर, अवश्य ही बार-बार पछतायगा ।
लेकिन जो तुमने खोया होगा, वह फिर न पाया जायेगा ।
और उस दिन बेटे ! तुम्हारा हृदय कुछ ऐसे प्रश्न पूछ लेगा ।
जिनके उत्तर तो देने होंगे, पर तुमको कष्ट बहुत होगा ।
एक बार फिर आस बाँध हम करते विनती दोनों कर जोड़ :
"बेटे ! सुन ले विनय हमारी, ना यूँ हमसे नाता तोड़ !"
मानो ना मानो मेरी यह इच्छा, "जैसी भी हो भगवद्इच्छा !"
जिनके उत्तर तो देने होंगे, पर तुमको कष्ट बहुत होगा ।
एक बार फिर आस बाँध हम करते विनती दोनों कर जोड़ :
"बेटे ! सुन ले विनय हमारी, ना यूँ हमसे नाता तोड़ !"
मानो ना मानो मेरी यह इच्छा, "जैसी भी हो भगवद्इच्छा !"
"प्रभु तुम्हें सद्बुद्धि दें, सदा सन्मार्ग पर चलाएँ !
जीवन का हर रोड़ा तुम्हें छोड़ कर, मेरे मारग में आ जाए !"
अपने कुल की लाज आज हम तुम्हारे हाथों में धरते हैं !
इसकी रक्षा का दायित्व तुम्हारा ! हम तुमसे विनती करते हैं !
बस इसी कामना के संग तुमसे आज विदाई लेते हैं !
तुम कहीं रहो, ख़ुश रहना बेटे ! दिल से दुआ हम देते हैं !
जीवन का हर रोड़ा तुम्हें छोड़ कर, मेरे मारग में आ जाए !"
अपने कुल की लाज आज हम तुम्हारे हाथों में धरते हैं !
इसकी रक्षा का दायित्व तुम्हारा ! हम तुमसे विनती करते हैं !
बस इसी कामना के संग तुमसे आज विदाई लेते हैं !
तुम कहीं रहो, ख़ुश रहना बेटे ! दिल से दुआ हम देते हैं !
- सरस्वती जोशी
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