कन्या-वध / भ्रूण हत्या
बेटी, कन्या या नारी के भागय की बात आई तो जग कर्ता तक गया हार ।
उसका जीवन-मरण या भू पर आगमन मानव ने ले लिया हाथ ।
रक्षक कब तक्षक बन डस लें वह यह जान नहीं सकती ।
औ विडंबना यह के इसमें जगकर्ता या भाग्यविधाता तक की है ना इक पल भी चलती ।
बेटी, कन्या या नारी के भागय की बात आई तो जग कर्ता तक गया हार ।
उसका जीवन-मरण या भू पर आगमन मानव ने ले लिया हाथ ।
रक्षक कब तक्षक बन डस लें वह यह जान नहीं सकती ।
औ विडंबना यह के इसमें जगकर्ता या भाग्यविधाता तक की है ना इक पल भी चलती ।
सृष्टिकर्ता स्वयं यहाँ अपनी सृष्टि से हार रहा है ।
सोनोग्राफी / ईकोग्राफी के यंत्रों को विवश सा हो निहार रहा है ।
बहुत था अभिमान उसको के वह मानव सी सृष्टि रचा रहा है ।
पर आज विवश सा मानव की करनी को देख अश्रु गिरा रहा है ।
सोनोग्राफी / ईकोग्राफी के यंत्रों को विवश सा हो निहार रहा है ।
बहुत था अभिमान उसको के वह मानव सी सृष्टि रचा रहा है ।
पर आज विवश सा मानव की करनी को देख अश्रु गिरा रहा है ।
अपना क्रोध प्रकट करने को कई कहर भी ढहाता है ।
पर मानव उनको तक कर नियंत्रित अपने मन की बात चलाता है ।
कन्या-वध जैसा जघन्य कृत्य खुले आम कर आता है ।
औ इक पल को भी मन उसका ज़रा नहीं घबराता है ।
पर मानव उनको तक कर नियंत्रित अपने मन की बात चलाता है ।
कन्या-वध जैसा जघन्य कृत्य खुले आम कर आता है ।
औ इक पल को भी मन उसका ज़रा नहीं घबराता है ।
वैसे तो जब भी चाहे जग ईश्वर-ईश्वर चिल्लाता है ।
पर कन्या-वध पातक करने में संकोच नहीं दिखाता है ।
ईश्वर का या नर्क-यातना का भय ना उसे सताता है ।
प्रायश्चित करने को इसका मंदिर तक ना जाता है ।
पर कन्या-वध पातक करने में संकोच नहीं दिखाता है ।
ईश्वर का या नर्क-यातना का भय ना उसे सताता है ।
प्रायश्चित करने को इसका मंदिर तक ना जाता है ।
किसी बोझ या पाप-भावना का भय ना उर में लाता है ।
बस चिकित्सकों को धन्यवाद में कुछ सिक्के ले थमाता है ।
औ ऋण या दंड या कष्ट मुक्त सा हँसता सा घर को आता है ।
बोझ-मुक्त सा मान स्वयं को मन में ग्लानि तक ना लाता है ।
बस चिकित्सकों को धन्यवाद में कुछ सिक्के ले थमाता है ।
औ ऋण या दंड या कष्ट मुक्त सा हँसता सा घर को आता है ।
बोझ-मुक्त सा मान स्वयं को मन में ग्लानि तक ना लाता है ।
वैसे तो पशु-पक्षी तक की रक्षा की गुहार लगाता है ।
कभी ईश तो कभी नर्क का नाम ले-ले डराता है ।
कन्या-वध या भ्रूण-हत्या की बारी आए तो तनिक नहीं विचलित होता ।
ना कोई अपराध-भावना, ना डर यम का ना धर्मराज का,
ना ही बोझ पाप-कर्म का, निर्भय हो घर में है सोता ।
कभी ईश तो कभी नर्क का नाम ले-ले डराता है ।
कन्या-वध या भ्रूण-हत्या की बारी आए तो तनिक नहीं विचलित होता ।
ना कोई अपराध-भावना, ना डर यम का ना धर्मराज का,
ना ही बोझ पाप-कर्म का, निर्भय हो घर में है सोता ।
हे प्रभु ! अब तो इतनी नगण्य औ बेबस है जगती की कन्या या नारी ।
उसके अस्तित्व तक पर आन पड़ी है औ है वह बस बेबस बेचारी ।
क्या उसके रक्षक बन कर हरि ! कोई चमत्कार करोगे ?
क्या इस क्रूरता का हल निकाल तुम कन्या /नारी का बेड़ा पार करोगे ?
हे जग रक्षक ! जग के इस बेबस प्राणी पर कब करुणा का संचार करोगे ?
कब तक मान नगण्य उसे शेष-शैया पर निश्चिंत हो विश्राम करोगे ?
-सरस्वती जोशी
उसके अस्तित्व तक पर आन पड़ी है औ है वह बस बेबस बेचारी ।
क्या उसके रक्षक बन कर हरि ! कोई चमत्कार करोगे ?
क्या इस क्रूरता का हल निकाल तुम कन्या /नारी का बेड़ा पार करोगे ?
हे जग रक्षक ! जग के इस बेबस प्राणी पर कब करुणा का संचार करोगे ?
कब तक मान नगण्य उसे शेष-शैया पर निश्चिंत हो विश्राम करोगे ?
-सरस्वती जोशी
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