Monday, February 23, 2015

अपनत्व की आस

अपनत्व की आस
बचपन तो बीता गौरी का साधारण से घरबार में ।
पर बाप को थी "खाँत" कि ब्याहे किसी ऊँचे परिवार में ।
आखिर उसने एक बड़ा घर भाग दौड़ कर ढूँढ लिया ।
गदगद हो कर पूरे मन से उसने कन्यादान किया ।
जब फेरे हो ससुराल गई तो माँ ने लंबी लिस्ट थमाई ।
"इन सब से तेरा रिश्ता अब से," कह कर बस दे दी थी विदाई ।
हालाँके स्पष्ट नहीं बोली पर उसकी बात समझ में आई ।
"अब से होगा वह घर तेरा ! बहू वहाँ की ! यहाँ की है तू केवल "जाई" ।"
जाने कैसे वह भूल गई के : बेटी उसकी है "ग़रीब की जाई" ।
बस आनंदित थी सोच-सोच : "बड़े घर में है बेटी ब्याही ।"
औ गौरी पहुँच गयी वहाँ पर भूल कर हर रिश्ता पुराना ।
ध्येय जीवन का उसने बनाया : "बस सबका अपनत्व पाना ।"
मान-अपमान की व्याख्या भूली, सब को मन से अपना मान ।
रिश्ते निभाने के नाम पर ही वह होती रही बार-बार कुर्बान ।
सोचा : कभी तो अपनाएँगे समझ कर हमको भी अपना ।
भूल जग मिथ्या माया जाल, बस है यह एक विचित्र सा सपना ।
स्नेह की लौ जला, अपनत्व की आस में, एक ही ध्येय पर अडिग हो अड़ी रही ।
जब कि सबको कितने ही काम थे, औ गौरी तो नगण्य में भी थी नहीं ।
जिनको पिघलना ही नहीं था, वे तो कभी पिघले नहीं ।
गौरी जिंदगी को निचोड़ कर पूरती रही दिये में कि जलता रहे, बुझ न जाए कहीं !
भूली रिश्ता हरि तक का, पर नादानी नज़र न आई कभी ।
ना सोचा के क्षणभंगुर जीवन इसी में न बीत जाए कहीं !
जब होश में आई, औ सत्य आया समझ में, तो देखा इसी में, उमर बीत गई युँही !
कितने ज़रूरी काम, सब रह गये अधूरे, क्या समय को यूँ खोना था सच में सही ?
जीवन का ध्येय अब तो मालूम था उसे, पर पूरा करने का समय तो बचा ही नहीं !
अब होश भी उसको था चुभता हृदय में, काश सत्य का भान होता ही नहीं !
जा पाती जगत से झूठी ही आस ले कर,जीवन को व्यर्थ खोने का अहसास होता नहीं ।
तसल्ली से आँखें मूँद लेती सदा को, खुद को अंधों सा नासमझ तो पाती नहीं !
विचलित सी हो जाती थी वह, इक प्रश्न पूछता था उसका मन !
अपनत्व की आस में तरसते से दौड़ो, क्या बस इसी को कहते हैं नारी-जीवन ?
सरस्वती जोशी

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