Wednesday, February 25, 2015

संपत मानता है पिता का अहसान ।

हार्दिक बधाई व शुभ कामनाएँ भैया ! 

संपत मानता है पिता का अहसान । 
पर वह केवल पिता हेतु नहीं जन्मा, 
पिता को लेना है जान ।

उसका क्षेत्र असीम जगत में,
सबसे है उसकी पहचान । 
उसकी कलम हर घर में जाती,
सबको अपना कोई मान । 
दुखिया के आँसू हों या फिर,
होए सुखिया की मुस्कान । 
चाहे हो परम ज्ञान का दाता,
या वह जिसमें भरा हुआ अज्ञान । 
सबके घर में झाँक देख वह,
उनके जीवन को लेता पहचान । 
डाल रोशनी आँख खोलता,
पीर बँटाता रख कर ध्यान ।
इसमें कब दिन ढल जाता है,
इसका उसे नहीं है भान । 
बस पर हित हेतु समर्पित जीवन,
हर पल का करता है दान । 
ईश्वर उसकी कलम को इतनी,
दिव्य शक्ति से युत कर दे । 
के वह हर घर में जा जा कर,
जन-जन की पीड़ा हर ले ! 
- सरस्वती जोशी

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