Thursday, March 26, 2015

टूटे रिश्तों या पीड़ा के किरचे

टूटे रिश्तों या पीड़ा के किरचे
टूटे रिश्तों या पीड़ा के किरचे जाने क्यों यूँ उर में बस जाते हैं ।
हम प्रयास कर कर उन्हें भुलाने में अपना समय गँवाते हैं ।
पर वे तो वेदमंत्रों से भी अधिक अहम् बनते जाते हैं । 
पूजा में बैठे मानव तक के मानस पर बादल से आ छा जाते हैं !
अश्रु-धार में नेत्र उन्हें बारंबार बहाते हैं ।
पर वे लौट-लौट मन के कोने में आ आ कर छिप जाते हैं ।
मन करता किसी को ना दिखलाएँ पर होठों पर आ ही जाते हैं ।
सीता हो या शकुंतला सबकी व्यथा-कथा बन जाते हैं ।
रामायण, महाभारत या फिर लघु-कथा बन प्रकट होते हैं ।
कभी पाठ, कभी मिसाल रूप में हम भी उन्हें दोहराते हैं ।
समय के साथ और स्मृतियाँ जब लुप्त सी होने लगती हैं ।
तब भी जाने कैसे उनकी यादें आख़िर तक बच ही रहती हैं ।
"भूलो बीती बातों को..." सब हरदम यह दोहराते हैं ।
पर अपनी बारी आने पर ख़ुद को असमर्थ सा पाते हैं ।
जो टूट गये उनके टुकड़े क्यों यूँ मूल्यवान हो जाते हैं !
हम क्यों न उन्हें विस्मित कर अपने पथ पर आगे बढ़ पाते हैं ?
- सरस्वती जोशी

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