अमी-विष भरा यह जीवन
प्रभु ! तुमने इक बार पिया विष,
तो पूज्य मान कर तुमको,
हर ग्रंथ बढ़ा-चढ़ा कर के,
गुणगान तुम्हारा करता है ।
जब के तुम तो थे अमर नाथ !
तुम्हारा ही रचित किया विष,
वध न तुम्हारा कर सकता है ।
तो पूज्य मान कर तुमको,
हर ग्रंथ बढ़ा-चढ़ा कर के,
गुणगान तुम्हारा करता है ।
जब के तुम तो थे अमर नाथ !
तुम्हारा ही रचित किया विष,
वध न तुम्हारा कर सकता है ।
माना के तुमको मिला श्रेय प्रभु !
हर कष्ट भयानक जगती का,
उसकी रक्षा कर देने का ।
पर क्या सच में खतरा था तुमको,
उस विष से कुछ खो देने का ?
हर कष्ट भयानक जगती का,
उसकी रक्षा कर देने का ।
पर क्या सच में खतरा था तुमको,
उस विष से कुछ खो देने का ?
मर्त्य लोक का प्राणी तो प्रभु !
कदम-कदम पर अश्रु पोंछ कर,
यह भीषण विष चखता है ।
मीरा या प्रहलाद बना वह,
मान कर प्रसाद तुम्हारा,
शीश चढ़ा कर पी लेता है ।
कदम-कदम पर अश्रु पोंछ कर,
यह भीषण विष चखता है ।
मीरा या प्रहलाद बना वह,
मान कर प्रसाद तुम्हारा,
शीश चढ़ा कर पी लेता है ।
वैसे भी वह विवश बिचारा,
औ कर भी क्या सकता है !
शक्ति माँगता पी पाने की,
औ तुम्हें याद कर लेता है ।
औ कर भी क्या सकता है !
शक्ति माँगता पी पाने की,
औ तुम्हें याद कर लेता है ।
हास-अश्रु या विष-अमृत के,
जीवन को बस जी लेता है ।
अगले जन्म से मुक्ति हेतु कुछ,
जप-उपासना कर लेता है ।
जीवन को बस जी लेता है ।
अगले जन्म से मुक्ति हेतु कुछ,
जप-उपासना कर लेता है ।
कहते हैं यह तो सब उसके,
कर्मानुसार ही होता है ।
जैसे जितने कर्म कियें हों,
अमृत या विष मिलता है ।
कर्मानुसार ही होता है ।
जैसे जितने कर्म कियें हों,
अमृत या विष मिलता है ।
रोक नहीं पा रहे इसीसे,
एक प्रश्न हम पूछेंगे ।
क्षमा करें अपराध हमारे,
आशा है रुष्ट नहीं होंगे ।
एक प्रश्न हम पूछेंगे ।
क्षमा करें अपराध हमारे,
आशा है रुष्ट नहीं होंगे ।
आपने भी कष्ट देखे जीवन में,
बन सुदृढ़ पग-पग पर यहाँ,
भीषण विषों का पान किया ।
दक्ष पुत्री सती को त्यागा,
पिता-पति परित्यकता ने जा,
यज्ञाग्नि में आत्म दाह किया ।
बन सुदृढ़ पग-पग पर यहाँ,
भीषण विषों का पान किया ।
दक्ष पुत्री सती को त्यागा,
पिता-पति परित्यकता ने जा,
यज्ञाग्नि में आत्म दाह किया ।
विरह विकल हो कर के आप,
शव ले कर चहुँ ओर गये ।
उसको पूजित करा धरा पर,
शक्ति पीठ स्थापित किये ।
शव ले कर चहुँ ओर गये ।
उसको पूजित करा धरा पर,
शक्ति पीठ स्थापित किये ।
श्याम वर्ण काली भी तो,
किसी कष्ट से होकर पीड़ित,
देह-त्याग गौरी (गणगौर/ गौरल) बन आई ।
तभी उसने सही पदवी,
सच्ची सुहागिनी की पाई ।
किसी कष्ट से होकर पीड़ित,
देह-त्याग गौरी (गणगौर/ गौरल) बन आई ।
तभी उसने सही पदवी,
सच्ची सुहागिनी की पाई ।
मिलन-विरह, सुख-दुख में जैसे,
गोते खाता पृथ्वी का मानव ।
जीवन के विविध विषों का प्रभु !
आपको भी उतना ही अनुभव ।
गोते खाता पृथ्वी का मानव ।
जीवन के विविध विषों का प्रभु !
आपको भी उतना ही अनुभव ।
इसी लिये मैं हाथ जोड़ कर,
माँग रहे वर कर के विनती ।
क्या धरती के मानव को भी प्रभु !
दे दोगे इतनी सी कुछ शक्ति !
माँग रहे वर कर के विनती ।
क्या धरती के मानव को भी प्रभु !
दे दोगे इतनी सी कुछ शक्ति !
या कोई सरल उपाय बतादो,
जो उसके उर में भर दे भक्ति !
औ विष-पानों से मानव को,
दिला सके थोड़ी सी मुक्ति ?
जो उसके उर में भर दे भक्ति !
औ विष-पानों से मानव को,
दिला सके थोड़ी सी मुक्ति ?
- सरस्वती जोशी
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