पर्वत-नदी-सागर
(पिता-पुत्री-दामाद)
तू मेरे उर से निकली,
मेरे प्राणों की थी आधार ।
चाहा तुझे बाँध कर रखना,
पर तुझे नहीं था यह स्वीकार ।
जाने कैसे दूर बसे उस,
सागर ने तुझको भरमाया ।
जब मैंने यह महसूस किया तो,
मन तुझे रोकने को अकुलाया ।
पर तू तोड़ शिला खंडों को,
निकली, अवरोहण की ठानी ।
मुक्त वेग से इठलाती सी,
उर में भरा स्नेह का पानी ।
पथ की बाधा से टकराती,
सागर प्रेम में लीन मदमाती ।
तोड़ सभी से मोह का नाता,
तू चली छोड़ सब संगी साथी ।
पहुँच पायगी युग या पल में,
तुझको इसका कहाँ होश था !
बस सागर तक जाऊँगी मैं,
मन में इसका जोश भरा था ।
गर कोई बाधा बन आया,
पल में उसको दूर किया ।
जगती तुझको रोक न पाई,
गर्व सभी का चूर किया ।
प्रिय मिलन की बेला जब आई,
प्रेम-रस में तू थी भरमाई ।
जा लिपटी सागर से ऐसे,
बस फिर कभी नज़र ना आई ।
माना के भर कर आलिंगन में,
उसने तुझको अपना लिया ।
पर बदले में उसने तेरा,
अपना अस्तित्व ही मिटा दिया ।
बदल गई उस दिन से तू बस,
नहीं रही कोई पहचान ।
लुप्त हो गई सागर-जल बन,
रहा न कोई नामो निशान ।
पूर्ण समर्पण की मिसाल तू,
योगी सी अंतर्ध्यान हुई ।
पर शायद कुछ स्मृतियाँ मन में,
मैके की फिर भी बनी रहीं ।
प्रेम-साधना में डूबी तू ,
बढ़ चली अपने लक्ष्य की ओर ।
तोड़ के मुझसे सारे रिश्ते,
हो कर के बस प्रेम-विभोर ।
पर मेरे इस व्याकुल मन की,
तड़प अचानक समझ में आई ।
और मेरे सरल स्नेह को,
तू ठुकराने से घबराई ।
इसी लिये जब मेरी आँखें,
यादों में तरसा करती हैं ।
तेरे वाष्प-कणों को ला कर,
बदली यहाँ बरसा करती है ।
और समझ जाता मेरा मन,
जब भी यहाँ वर्षा होती है ।
तू समय-समय पर ध्यान रख,
कुछ स्नेह कण भेजा करती है ।
सरस्वती जोशी
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