चारों ओर वही तो है,
हर उससे मिलने को बेचैन सूरत की मासूमियत में,
हर उससे रूठे मन की अहमियत में,
उसकी प्रतीक्षा-रत उदास आँखों की अधीरता में,
उसकी स्मृति में डूबे सरल मन की सहजता में,
भक्ति से सराबोर निर्झर के कलकल में,
मरुथल के अंतर में उठती विकल हलचल में,
चारों ओर वही आभासित, हर शब्द उसी को समर्पित,
उस हेतु ही हर भाव अर्पित, उसी के राग से रंजित,
पर यह जो उससे तनिक सी दूरी का अहसास है,
यह जो उससे मिलने की चिर प्यास है,
एक दिन उससे एकीकार होने की आस है,
इसीसे तो तुम्हें अपने अस्तित्व का आभास है,
क्या सचमुच तुम्हें जल्दी है इसे खोने की ?
उसके नूर के असीम प्रकाश में विलीन हो सोने की ?
सरस्वती जोशी

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