आशा के वे क्षण !
जीवन में वैसे भी ज़्यादा तो कुछ मिला नहीं था,
पर हे मालिक ! जो कुछ थोड़े से करुणा के कण,
भूले से शायद बाँट दिये थे यूँ ही अनजाने में, बे मन,
ले लिये वापस उन्हें, पूरी तरह कठोर सा बन,
क्या कमी करुणा की तुझको ऐसी आन पड़ी मन-मोहन ?
बड़ी आस बाँधी थी तुझ से जब तू थोड़ा सा पिघला था,
तेरा दिव्य प्रकाश जैसे अँधियारे घर में भी फैला था ।
सर पर आशीर्वाद भरा इक हाथ रख दिया हो मानों,
उर में इक विश्वास जगा जो थाम रहा था हर क्रंदन !
भय बस थी कुछ कमी शक्ति की, फिर भी कायम थे कुछ सपने,
बढ़ने का उत्साह जगा था, चमकी कुछ आशा की किरणें,
लगता था : "है कोई मेरा," चाहे छोड़ें मझधार सभी अपने,
पर जाने क्यों तूफान भेज, मिटा दिये आशा के वे क्षण !
सरस्वती जोशी

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