यह मीठे जल की सुंदर नदिया कहलाती है "खारी" !
जगती के निर्णय के आगे बेबस है बेचारी !
कारण इसका जान न पाई ।
मीठा जल ही दिया सदा ही ।
कोई कहता : "इसके उद्गम से जुड़ी किसी की अश्रुधार ।"
कोई कहता : "उफन पड़े तो मचा दे भारी हाहाकार ।"
पर जो भी हो "खारी" संबोधन कुछ विचित्र सा लगता है ।
मेरा मानस तो इसको "मीठी" कहने को करता है ।
सरस्वती जोशी

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