Late Dr. V. R. JOSHI Paris ki punya smriti men,
जा सके क्यूँ कर कहीं ?
जा सके क्यूँ कर कहीं, यूँ अकेला छोड़ हमको ?
क्यों नहीं आई ज़रा, कुछ देर मेरी याद तुमको ?
कितने वादे, कितने सपने, समझे थे हम जिनको अपने,
देखो कैसे विकल हृदय से, आज पुकारा करते तुमको ।
भग्न स्वप्न की टूटी साँसें, ये बिखरी-बिखरी सी आसें,
मौन व्यथा के स्वर भर-भर कर, पूछ रहे कुछ बातें तुमको ।
कैसे निर्मम हो पाए थे, हम तो थे निर्बल बेचारे ?
छोड़ गए तुम ऐसे कैसे, तोड़ हमारे सभी सहारे ?
पीड़ित मन के हर लम्हे ने, बसा रखा अंतर में तुमको ।
सरस्वती जोशी
चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वह कौनसा देश जहाँ तुम चले ---

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