ज़माना "अबला" कहता है,
शायद ज़माने की यही चाहत हो ।
कब किसने चाहा भला,
कि नारी में भी क्षमता हो ?
सदा नत मस्तक हो कर रहे,
क्या नहीं यह सब की मनो-कामना ?
वह बात अलग नारी ना समझे,
जग के अंतर की भावना ।
सच में तो नारी ने स्वयं सदा ही,
अपनी शक्ति को पहचाना है ।
जब भी जग ने उसके मधुर रूप को,
उसकी दुर्बलता कर माना है ।
तब-तब बन दुर्गा-चंडी,
वह दुष्टों का वध कर देती है ।
वह बात अलग वह माँ के स्वरूप को,
अधिक मान्यता दे देती है ।
वात्सल्य भाव की कोमलता में,
डूब सभी कुछ सह लेती है ।
सृजन हेतु आई है जग में,
सदा याद यह रखती है ।
इसीलिये पीड़ा सहकर भी,
कई बार चुप रहती है ।
लेकिन उसके हर स्वरूप में,
भीतर इक अलग रूप भी रखती है ।
जिसकी प्रबल शक्ति के आगे,
जग कर्ता तक डरता है ।
वह भी उसको जगदंबा कह,
झुक कर प्रणाम तक करता है ।
शायद इसीलिये नारी-उर में,
भरे उसने क्षमा-करुणा-वात्सल्य के भाव ।
और वह सह लेती पीड़ा,
बिना किये विद्रोह की चाह ।
सरस्वती जोशी
शायद ज़माने की यही चाहत हो ।
कब किसने चाहा भला,
कि नारी में भी क्षमता हो ?
सदा नत मस्तक हो कर रहे,
क्या नहीं यह सब की मनो-कामना ?
वह बात अलग नारी ना समझे,
जग के अंतर की भावना ।
सच में तो नारी ने स्वयं सदा ही,
अपनी शक्ति को पहचाना है ।
जब भी जग ने उसके मधुर रूप को,
उसकी दुर्बलता कर माना है ।
तब-तब बन दुर्गा-चंडी,
वह दुष्टों का वध कर देती है ।
वह बात अलग वह माँ के स्वरूप को,
अधिक मान्यता दे देती है ।
वात्सल्य भाव की कोमलता में,
डूब सभी कुछ सह लेती है ।
सृजन हेतु आई है जग में,
सदा याद यह रखती है ।
इसीलिये पीड़ा सहकर भी,
कई बार चुप रहती है ।
लेकिन उसके हर स्वरूप में,
भीतर इक अलग रूप भी रखती है ।
जिसकी प्रबल शक्ति के आगे,
जग कर्ता तक डरता है ।
वह भी उसको जगदंबा कह,
झुक कर प्रणाम तक करता है ।
शायद इसीलिये नारी-उर में,
भरे उसने क्षमा-करुणा-वात्सल्य के भाव ।
और वह सह लेती पीड़ा,
बिना किये विद्रोह की चाह ।
सरस्वती जोशी
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