ये माँ, मानवी, या इस जगती की नारी,
जो कभी ना हिम्मत हारी ।
जिससे लेता है प्रेरणा संसार ।
जो बिना संतुलन खोये, बिना चिल्लाये,
बिना रोये,
जीवन के संघर्षों को कर रही स्वीकार ।
रख आशा का दीपक सर पर,
भव के दरिया के भीषण वेग से लड़ने को सेनानी सी तत्पर,
हो कर के बिलकुल निडर, है दृढ़ विश्वास कि होगी पार ।
ले मन में सुधरे भावी की आस
, बिना मन को किये उदास,
सोच कर : "जब जीना है तो चलना होगा, अविरत आगे बढ़ना होगा ।"
समझ गई : "है यही जीवन !" इसके साहस,
इसकी दृढ़ता को करती मैं सादर नमन ।
सरस्वती जोशी
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