Thursday, August 21, 2014

हम व्यस्त आधुनिक सुशिक्षितगण !

हम व्यस्त आधुनिक सुशिक्षितगण !
हम व्यस्त आधुनिक सुशिक्षितगण !
प्रबल बुद्धिपक्ष नहीं भावुक मन !
किसी के घर पर खुशियों की,
लाटरी खुले तो पागल बन कर,
उत्सव कर-कर, रात-रात भर,
चिल्ला-चिल्ला, गीत गा कर,
मस्ती से झूम, जग को जगा कर,
ख़ुशियाँ मनाएँ, बाजे बजा कर,
हाहा-हीही करें इठला कर !
नहीं ! अब हर घटना हमको,
बस इक सीमा तक ही छू पाती है ।
या किसी के भी निधन पर,
सब को सुनाएँ विलाप कर-कर !
रोते रहें भें-भें कर-कर !
हमने संतुलित प्राणी बन कर !
इन सब को गँवारपन मान कर !
त्याग अब प्राचीन जर्जर !
मिटा दिया कानून बना कर !
अब ये व्यर्थ बातें हमारी,
रातें नहीं ले पाती हैं ।
ना व्यर्थ अश्रुपात कर,
ना व्यर्थ का विलाप कर,
दुख पी जाते कठोर बन कर,
भावों के बहते दरिया से,
आँखें मचल जाएँ बहक कर,
जो तुलें भेद खोलने पर,
तो चश्मा धूप का लगा कर,
मन के भाव मन में छिपा कर,
इस तरह कंट्रोल करते,
कि जगती जान नहीं पाती है ।
कोई हँसे हँसता रहे ।
किसी का दिल रोए रोता रहे।
किसी का दिल दुखे दुखता रहे ।
कोई जिए जीता रहे, मरे मरता रहे ।
औरों के दुख, उनकी रुलाई,
उन सब में परनिंदा समाई ।
सो ना हम पराई बात सुनते ।
ना अपनी हालत बताते ।
जगती की दीन दशा अब छूकर,
इस मन को नहीं पिघला पाती है ।
विधवा पड़ोसन भरे ठंडी साँसें,
दुखिया बहू की हो गीली आँखें,
दीनू की नौकरी चली जाए,
मीनू की माँ भीख माँग कर खाए,
ये दुनिया के झमेले चलते रहेंगे ।
कर्मों के फल सबको मिलते रहेंगे ।
श्रवण को मरने का फल तो,
दशरथ को मिलना ही था ।
राम को शाप मिला नारद का,
सीता हरण तो होना ही था ।
जो लिखा टलता नहीं सो,
अब ये बातें हमें रुला कर,
ख़ून नहीं जला पाती हैं ।
अब हम सीमित संतुलित रह कर,
रोते भी हैं कंट्रोल कर-कर ।
व्यर्थ ज़ोर से ना चिल्ला कर,
परंपराओं में आधुनिकता मिला कर,
खुश भी हों तो धीरे से हँस कर,
हर बात को गंभीर मान कर,
"भीतर सार छिपा," सोच कर,
उस छिपे ज्ञान की खोज हमें,
प्रभावित नहीं कर पाती है ।
अब जगत की परिस्थितियाँ हमें,
हँसा पाती नहीं, रुला पाती नही ।
हम २१वीं सदी के सचेत मानव !
अब जगती हमें जंजाल में,
देखो फँसा पाती नहीं है ।
सरस्वती जोशी

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