गुलाब और काँटे
गुलाब की नियति है,
काँटों के साथ में रहना ।
विपरीत गुणों से युक्त साथी को,
कदम-कदम पर सहना ।
ज्ञात है उसे कि वे,
चुभे बिना ना रह पाएँगे ।
उनका अपना जो स्वभाव है,
वे छोड़ न उसको पाएँगे ।
पीड़ा पहुँचा कर औरों को,
वे सुख का अनुभव करते हैं ।
प्रभु ने गुलाब के साथ बसाया,
पर वे हरदम उससे जलते हैं ।
उन्हें गुलाब का सुंदर सौरभ,
कभी रास नहीं आता ।
औ गुलाब बिन सौरभ फैलाए,
कभी नहीं रह पाता ।
बस में है ना उसके,
अपनी नियति को बदल देना ।
पर उसने सीख लिया कैसे,
अपने हित की रक्षा करना ।
अनगिन काँटों से घिर कर भी,
कंटक मय ना बनना ।
कैसे खल से ले कर दूरी,
अंतर में सिमटे रहना ।
औ फैला अपना सुखमय सौरभ,
सबको ही हर्षित करना ।
सरस्वती जोशी

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