ज़िंदगी ! तेरे होने का अर्थ ढूँढ रहे हैं,
इस कूड़े के ढेर में ! सुना है :
"भारत में विवाह में रोड़ी पूजते हैं ।
रोड़ी में रत्न पैदा हो जाते हैं कभी-कभी..."
रोड़ी कोख की प्रतीक, कहने को महान,
पूजनीय फिरभी अवहेलना की पात्र !
यही है शायद कइयों के जीवन का सत्य !
यहीं पैदा हुए एक दिन, न जाने क्यों,
कभी चाहे, कभी अनचाहे, शायद यहीं,
इस पंच तत्व के ढेर में विलीन होने को ।
शायद यही उनके आदि अंत की सीमा । क्या पता !
जो भी नियति की होगी चाह,
मिलेगी उन्हें वही राह !
पर क्यों सोचें इस पर ? समय कहाँ ?
कितना कुछ ढूँढना बाकी है,
ताकि शाम को पेट में कुछ पड़ सके।
फिलहाल तो जीवन का यही अर्थ है कि :
"रोड़ी में रतन ढूँढें, ढूँढते रहें,
बिना थके, बिना रुके, बस ! .. "
सरस्वती जोशी

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