कन्या "परधन"
कैसे कहूँ, क्या कहूँ ओ बेटी !
कैसे अपनी व्यथा बताऊँ ?
मन के भाव तुझे समझाऊँ !
जगती की रीत ही न्यारी है ।
यह सोच नहीं पाती है के,
तू तो अब भी मुझको प्यारी है ।
कन्या "परधन" कहलाती है,
ससुराल एक दिन जाती है ।
बस उस दिन से वह बन "परधन",
बिना बुलाए ना आती है ।
अपने पति के घर के रंग में,
चुपचाप सदा को रंग जाती है ।
मैका याद कभी आए तो,
हो मौन स्वयं को समझाती है ।
विस्मित सा करदेती है के,
कहीं जनम लिया था उसने ।
पर उस घर की स्मृतियों को संजो,
सदा रखती है मन में ।
दक्ष पुत्री ने तोड़ा बंधन,
बिना बुलाई आई थी ।
बदले में जो पाया सुन कर,
अग्निकुंड में समाई थी ।
सीता ने समझदार बन कर,
इक आश्रम को अपनाया था ।
पर पिताश्रिता बन जा मैके में,
जीवन नहीं बिताया था ।
शकुंतला परित्यक्ता हो कर,
रिषि आश्रम में आई थी ।
पर निराश हो भटक वनों में,
अपनी उमर बिताई थी ।
इसीलिये कहती हूँ बेटी!
मिथ्या भ्रम में मत रहना ।
पति का घर ही स्वर्ग तुम्हारा,
याद इसे हरदम रखना ।
यह न सोचना ये बातें मैं,
लिखती हूँ खुश हो-हो कर ।
हाथ काँपते हैं मेरे,
आँसू बहते हैं झर-झर ।
लेकिन जग के नियम बदलना,
इस निर्बल के हाथ नहीं है ।
जग शक्ति कहे या माता मुझको,
पर इसमें वह मेरे साथ नहीं है ।
पर चाहे रहो कहीं पर भी तुम,
मन माँ का सदा साथ होगा ।
मेरी साँस-साँस से हरदम,
आशीर्वाद तुम्हें देगा ।
सरस्वती जोशी
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