Friday, September 5, 2014

कन्या "परधन"

कन्या "परधन"
कैसे कहूँ, क्या कहूँ ओ बेटी !
कैसे अपनी व्यथा बताऊँ ?
मन के भाव तुझे समझाऊँ !
जगती की रीत ही न्यारी है ।
यह सोच नहीं पाती है के,
तू तो अब भी मुझको प्यारी है ।

कन्या "परधन" कहलाती है, 
ससुराल एक दिन जाती है । 
बस उस दिन से वह बन "परधन", 
बिना बुलाए ना आती है ।

अपने पति के घर के रंग में,
चुपचाप सदा को रंग जाती है । 
मैका याद कभी आए तो,
हो मौन स्वयं को समझाती है ।

विस्मित सा करदेती है के,
कहीं जनम लिया था उसने । 
पर उस घर की स्मृतियों को संजो,
सदा रखती है मन में ।

दक्ष पुत्री ने तोड़ा बंधन,
बिना बुलाई आई थी । 
बदले में जो पाया सुन कर,
अग्निकुंड में समाई थी ।

सीता ने समझदार बन कर,
इक आश्रम को अपनाया था । 
पर पिताश्रिता बन जा मैके में,
जीवन नहीं बिताया था ।

शकुंतला परित्यक्ता हो कर,
रिषि आश्रम में आई थी । 
पर निराश हो भटक वनों में,
अपनी उमर बिताई थी ।

इसीलिये कहती हूँ बेटी! 
मिथ्या भ्रम में मत रहना । 
पति का घर ही स्वर्ग तुम्हारा, 
याद इसे हरदम रखना ।

यह न सोचना ये बातें मैं,
लिखती हूँ खुश हो-हो कर । 
हाथ काँपते हैं मेरे, 
आँसू बहते हैं झर-झर ।

लेकिन जग के नियम बदलना,
इस निर्बल के हाथ नहीं है । 
जग शक्ति कहे या माता मुझको,
पर इसमें वह मेरे साथ नहीं है ।

पर चाहे रहो कहीं पर भी तुम, 
मन माँ का सदा साथ होगा । 
मेरी साँस-साँस से हरदम,
आशीर्वाद तुम्हें देगा ।

सरस्वती जोशी

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