Saraswati Joshi बेटी
मानलो के बेटी घर की न पारस है़, न ही मान ।
न पूजा, न ही विधाता, न किसी घर का गुमान ।
वह तो है बस इस समाज में केवल खर्चे का भंडार ।
जो आती इस धरा पर बन कर अपने ही पिता पर भार ।
पर बेटी है किसी घर की तो लक्ष्मी, सृष्टि की रचना का आधार ।
जिसके बिना होगा जग सूना, मिट जाएगा यह सुंदर संसार !
बेटी या कन्या ही बनती माँ, भाभी, या किसी की बहन ।
प्रेम क्षेत्र में लीला करती सीता, राधिका, रुक्मिणी बन ।
शक्ति है वह इस जगती की रक्षा कर हरती सबके शूल ।
हो निर्मम उसका वध करना है यह कितनी भारी भूल ।
एक दिन जब महत्व उसका जग की समझ में आएगा ।
गर समय निकल गया हाथ से तो हर मानव पछताएगा ।
सरस्वती जोशी
मानलो के बेटी घर की न पारस है़, न ही मान ।
न पूजा, न ही विधाता, न किसी घर का गुमान ।
वह तो है बस इस समाज में केवल खर्चे का भंडार ।
जो आती इस धरा पर बन कर अपने ही पिता पर भार ।
पर बेटी है किसी घर की तो लक्ष्मी, सृष्टि की रचना का आधार ।
जिसके बिना होगा जग सूना, मिट जाएगा यह सुंदर संसार !
बेटी या कन्या ही बनती माँ, भाभी, या किसी की बहन ।
प्रेम क्षेत्र में लीला करती सीता, राधिका, रुक्मिणी बन ।
शक्ति है वह इस जगती की रक्षा कर हरती सबके शूल ।
हो निर्मम उसका वध करना है यह कितनी भारी भूल ।
एक दिन जब महत्व उसका जग की समझ में आएगा ।
गर समय निकल गया हाथ से तो हर मानव पछताएगा ।
सरस्वती जोशी
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