Saturday, August 23, 2014

ये अधूरे सपनों के ढेर !

ये अधूरे सपनों के ढेर !
ये अधूरे सपनों के ढेर !
सिसक-सिसक कर पूछ रहे हैं ।
हम कभी साकार होंगे ?
या हस्ती ही मिट जायेगी ?
क्या कभी वसंत की कोयल,
आ कर गीत यहाँ गाएगी ?
कब कैसे ये जगे यहाँ पर ?
याद नहीं कुछ भी आता है ।
पर बन कर निर्मम मेरा मन,
इन्हें मिटा नहीं पाता है ।
हर बार जब तूलिका मेरी,
पतझड़ की कल्पना लाती है ।
तो ध्यान किसी का रोक लेता,
वसंत सी ही छबि बन जाती है ।
पर उस छबि में सदा कहीं कुछ,
थोड़ी कमी रह ही जाती है ।
औ निज को पा पूरा करने में अक्षम,
उर में कसक सी उठ आती है ।
पर बार-बार तेरी आशा ले,
हर आह मुझे समझाती है :
"विश्वास रख जग के पालक पर,
उसको सुध सब की आती है ।"
सरस्वती जोशी

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