क्रंदन
यह केवल आवाज़ नहीं, मेरे अंतर का स्वर है यह ।
उर के अंतर में बहता खारा एक समंदर है यह ।
नित्य उठता ज्वार इसमें, और थम जाता है फिर से,
नित्य उठती और गिरती लहर का क्रंदन है यह ।
उमड़ उठते बादलों की है कहीं काली घटा सी,
उस अँधेरे से घिरा, आता हुआ अंधड़ है यह ।
था कभी पावन, सुगंधित और शीतल जो रहा,
आज ठंडी रात में जलता हुआ चंदन है यह ।
यह केवल आवाज़ नहीं, मेरे अंतर का स्वर है यह ।
सरस्वती जोशी
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