Tuesday, July 15, 2014

समाज क्या कहेगा !

समाज क्या कहेगा !

प्रभु ने ख़ुश हो मानव बनाया !
कितने गुणों से उसे सजाया !
पर मानव ने समाज बना़या ।
मन मंदिर में उसे बिठाया ।

और भला वह क्यों ना करता ?
भगवान भरोसे कब तक रहता ?
वह प्रभु जो मूरत में छिपता । 
लाख प्रयत्न करें ना दिखता । 

पर समाज से सब कुछ मिलता ।
उस में ही वह बेटी ब्याहता । 
बहू भी समाज से लाता । 
उससे अपना वंश बढ़ाता । 

मान-सम्मान वही़ीं है पाता । 
वही तो उँचे पद दिलवाता ।
कैसे भी लक्ष्मी को लाओ ।
कोई भी साधन अपनाओ ।

बस तुम लक्ष्मी-पति बन जाओ । 
मन खोल उसकी रस्में निभाओ । 
जो उनका पालन ना कर पाओ ।
तो चुप-चुप आसन से उठ जाओ ।

अपनी सीमा लो पहचान !
सीमा सम होगा सम्मान !
कैसे भला मान गँवाएँ ?
कैसे नीचे बैठ जाएँ ?

लोग इसे तो समझ न पाते ।
"समाज क्या कहेगा ?" यूँ दोहराते ।
जैसे समाज से डरना भूल ! 
देख इसे चुभता है शूल ।

कहते : "देखो ! प्रभु से डरना !
जो वह चाहे सो ही करना !"
अरे प्रभु कौन भाग जायगा ?
जब बुलाओ आ ही जायगा ।

अंतिम साँस में भी पुकारो ।
एक दो आवाज़ें मारो ।
भोला- भाला दौड़ आयगा।
नाव पार करके ही जायगा ।

पर समज की बात है न्यारी ।
उससे निभानी रिश्तेदारी ।
सो मित्रो ! यह भय सदा रहेगा ।
"ध्यान रखना ! समाज क्या कहेगा !"

सरस्वती जोशी
मैंने "लोग" नहीं लिखा और "समाज" लिखा है, क्योंकि उस हालत में केवल पुरुषों पर आरोप लगता, लुगाइयाँ बच जातीं ।

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