Monday, July 28, 2014

चाय की प्याली

चाय की प्याली 
गर विश्व एकता का हम कोई पक्का सा प्रतीक विचारें । 
जिसको सब धर्मी मिल कर निर्विरोध हो कर स्वीकारें । 
जिसके मंदिर कदम-कदम पर निर्विवाद खुलते जाएँ । 
सब धर्मों व सभी जातियों के हो प्रसन्न भीतर को जाएँ । 
मन प्रसन्न हो जाए सब का खुश हो- हो कर भेंट चढ़ाएँ । 
खिले-खिले चेहरों से सब ही बन फुर्तीले बाहर आएँ । 
इससे ही दिन उगता सब का इससे ही होती है शाम । 
चाहे व्रत-उपवास करें पर चाय बिना ना चलता काम ।
इतने विभिन्न स्वाद भरे हैं, लगती सदा गुणों की खान । 
इसे अगर ना पेश करो तो रहे अधूरा अतिथि सम्मान । 
कृष्ण कन्हैया भी आएँ तो भूलेंगे अब माखन-मिश्री, 
लेंगे पहले चाय का नाम ? 

सरस्वती जोशी

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