चाय की प्याली
गर विश्व एकता का हम कोई पक्का सा प्रतीक विचारें ।
जिसको सब धर्मी मिल कर निर्विरोध हो कर स्वीकारें ।
जिसके मंदिर कदम-कदम पर निर्विवाद खुलते जाएँ ।
सब धर्मों व सभी जातियों के हो प्रसन्न भीतर को जाएँ ।
मन प्रसन्न हो जाए सब का खुश हो- हो कर भेंट चढ़ाएँ ।
खिले-खिले चेहरों से सब ही बन फुर्तीले बाहर आएँ ।
इससे ही दिन उगता सब का इससे ही होती है शाम ।
चाहे व्रत-उपवास करें पर चाय बिना ना चलता काम ।
इतने विभिन्न स्वाद भरे हैं, लगती सदा गुणों की खान ।
इसे अगर ना पेश करो तो रहे अधूरा अतिथि सम्मान ।
कृष्ण कन्हैया भी आएँ तो भूलेंगे अब माखन-मिश्री,
लेंगे पहले चाय का नाम ?
सरस्वती जोशी
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