वह सुनहरा बचपन
यह बात पुरानी है ।
बचपन की याद सुहानी है ।
सर्दी, गर्मी, बरसात हो ।
उजियाली-अँधेरी रात हो ।
हमें किसी से मतलब नहीं था ।
जीने का कोई मकसद नहीं था ।
माँ को ख़ुश रखें बस उसका स्नेह पायें ।
खायें-पियें औ मस्त सो जाएँ ।
स्कूल तो जाएँ पर कैसे भी अंक आएँ ।
बस कक्षा में अगली जा बैठ जाएँ ।
घर में बिजली या नल आएँ न आएँ ।
कोई चुनाव जीते या हार जाए ।
हमें न था इससे कुछ भी लेना देना ।
पर ध्यान रखते थे न टूटे खिलौना ।
औक़ात की सुध भूल सजाते थे सपने ।
चाँद को भी मान लेते थे हाथों में अपने ।
कितने सजल-सुंदर थे वे चंद दिन !
आज भी मुस्कुराते हैं उन्हें गिन-गिन ।
वे सुनहरे क्षण चाहे न लौट आएँ ।
पर संभव नहीं यह कि हम उन्हें भूल जाएँ ।
सरस्वती जोशी
No comments:
Post a Comment