Monday, July 14, 2014

वह सुनहरा बचपन

वह सुनहरा बचपन 

यह बात पुरानी है । 
बचपन की याद सुहानी है । 

सर्दी, गर्मी, बरसात हो । 
उजियाली-अँधेरी रात हो । 

हमें किसी से मतलब नहीं था । 
जीने का कोई मकसद नहीं था । 

माँ को ख़ुश रखें बस उसका स्नेह पायें । 
खायें-पियें औ मस्त सो जाएँ । 

स्कूल तो जाएँ पर कैसे भी अंक आएँ । 
बस कक्षा में अगली जा बैठ जाएँ । 

घर में बिजली या नल आएँ न आएँ । 
कोई चुनाव जीते या हार जाए । 

हमें न था इससे कुछ भी लेना देना । 
पर ध्यान रखते थे न टूटे खिलौना । 

औक़ात की सुध भूल सजाते थे सपने । 
चाँद को भी मान लेते थे हाथों में अपने । 

कितने सजल-सुंदर थे वे चंद दिन ! 
आज भी मुस्कुराते हैं उन्हें गिन-गिन । 

वे सुनहरे क्षण चाहे न लौट आएँ । 
पर संभव नहीं यह कि हम उन्हें भूल जाएँ । 

सरस्वती जोशी

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