Thursday, July 17, 2014

वह सुनहरा बचपन

वह सुनहरा बचपन
यह बात पुरानी है । 
बचपन की याद सुहानी है ।

सर्दी, गर्मी, बरसात हो । 
उजियाली-अँधेरी रात हो ।

हमें किसी से मतलब नहीं था । 
जीने का कोई मकसद नहीं था ।

माँ को ख़ुश रखें बस उसका स्नेह पायें । 
खायें-पियें औ मस्त सो जाएँ ।

स्कूल तो जाएँ पर कैसे भी अंक आएँ । 
बस कक्षा में अगली जा बैठ जाएँ ।

घर में बिजली या नल आएँ न आएँ । 
कोई चुनाव जीते या हार जाए ।

हमें न था इससे कुछ भी लेना देना । 
पर ध्यान रखते थे न टूटे खिलौना ।

औक़ात की सुध भूल सजाते थे सपने । 
चाँद को भी मान लेते थे हाथों में अपने ।

कितने सजल-सुंदर थे वे चंद दिन ! 
आज भी मुस्कुराते हैं उन्हें गिन-गिन ।

वे सुनहरे क्षण चाहे न लौट आएँ । 
पर संभव नहीं यह कि हम उन्हें भूल जाएँ ।

सरस्वती जोशी

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