Sunday, July 20, 2014

संध्या का जीवन




अविवाहिताओं द्वारा मनवाँछित पति, उदार सास, अच्छी ससुराल, मैके तथा भाई के सुख की प्राप्ति हेतु श्राद्ध पक्ष में १६ दिन तक पूजित देवी संध्या के जीवन की एक झलक ! 
संध्या केवल देवी नहीं हर कन्या की सहेली व बहन है, तथा हर घर की बहन-बेटी / कन्या का प्रतिनिधित्व भी करती है । इसके थापे तथा किला कोट डा० साधना जोशी-सुखवाल ने कनाडा में छपी एक पत्रिका में छापे थे, तथा श्री सुरेशजी ने उन्हें SNT में भी लगाया था !



संध्या का जीवन



सावन में भी पतझड़ सी सूनी शाम । 
ससुराल का छोटा सा गाँव । 
जा खेतों के पास नंगे ही पाँव । 
पथिक-हीन, वाहन विहीन, 
क्षितिज तक फैली लंबी राह । 
किसी खेत की अध-सूखी सी,
लंबी-सी खजूर के तले, सहमी सी,
तने से लिपटी खड़ी,
परम सुंदरी, भोली संध्या, 
अनमनी, उदास, देखती बाट ।
होती निराश बार बार । 
फिर भी बुनती आशा के तार ।
जा नित्य पथ लेती निहार ।




"मैके को जाती पगडंडियें पर खड़ी,
दूर-दूर तक देखती रहूँ ?
हाँ ! क्यों नहीं ! 
क्या पता आ जाय सुध, 
मेरी बिछुड़ी भौजाई को ।
माँ की आँख फरक जाए, 
वह भेजे लेने भाई को ।
किसी सहेली को तीजों के,
झूलों में ही आएँ याद ।
वे गीत जो मैं गाया करती थी, 
जिनमें करती थी फरियाद :
"माँ ! मुझको नहीं भुला देना !
भैया को भेज बुला लेना..."
आ गई संध्या की बेला ! 
पंछी लौट के घर को आए ।
अब न यहाँ कोई आएगा,
क्यों बैठी हूँ आस लगाए ?
कुछ पल और देख लूँ बाट ?
या पति के घर लौट जाऊँ ?
फिर से अपना वही नित्य का,
गृहणी का धर्म निभाऊँ ?"




लगा अगले दिन की आस,
लौट आती पति के द्वार ।
खाती थी नित्य सास की मार ।
सिर की फटी चूँदड़ तार-तार ।
पति भी तो नहीं मिला उदार ।
सोचती वह बार-बार :
"भाई न मुझे भुला पायेगा ।
इक दिन वह यहाँ आएगा ।
सिर पर धरेगा स्नेह का हाथ ।
बैठेगा कुछ देर साथ ।
मेरे कष्ट देख द्रवित हो कर,
आँसू की कर देगा बरसात ।
करुणा के दो बोल बोल कर,
मेरी पीड़ा करेगा शांत ।
कोई तो है दुख का साथी,
यह विश्वास जगा जाएगा ।
घर तो मुझे लौटना होगा,
पर दुखियारापन घट जाएगा ।
कटु शब्दो की बौछारें तो,
मिलना बंद नहीं होगा ।
जो नियति मिली है मुझे देव से,
उसको तो सहना ही होगा ।




यूँ नियति की कृपा की आस में,
मैके के प्रति जमे विश्वास में,
शामें आती रहीं, जाती रहीं ।
संध्या अटल बनी सी अपनी,
परंपराओं को निभाती रही ।
पर उसके जीवन की पीर,
सह न सका कोमल शरीर ।
और भव की उस पीड़ा से,
मुक्त हो गया उसका तन ।
विदा हो गई इस जगती से,
तोड़ रिश्तों के सब बंधन ।




मैके में समाचार आया ।
तो सब का मन भर आया ।
कैसे मन मजबूत बना कर,
नारी का कर्तव्य सिखाया !
कैसे बन कठोर समझाया :
"पतिगृह ही स्वर्ग तुम्हारा संध्या !
तुम परधन थीं, यह भूल न जाना !
खड़ी गई थीं तु उस घर में, 
बस आड़ी ही बाहर आना... "
और नारी-हृदय इस
अन्याय को ना सह पाया ।
हर सहेली ने संध्या की,
भूल उसकी "बलाई" जात को,
विस्मित कर जात-पाँत को,
मान कर देवी उसे, 
हर घर के बाहर कर चित्रित,
संध्या का थापा बनाया ।
श्रद्धा से कर के पूजन, 
बार-बार कर के वंदन ।
गा-गा कर उसका करुण जीवन,
श्रद्धांजलि दे किया नमन ।
एक नहीं पूरे सोलह दिन ।



सरस्वती जोशी

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