Tuesday, July 8, 2014

मुस्कुराहट के चार पल ।

सच्ची-सरल हँसी-मुस्कुराहट के चार पल । 
सुंदर-सुहने, सजल-सजल । 
जिन्हें ढूँढते सब सदा ही प्रति पल । 

सोच कर कि इन्हें पाना है सरल । 
रखते सब पाने की इच्छा प्रबल । 

किंतु क्या "राम" कभी खुल कर हँस पाये ? 
क्या सीता के जीवन में ऐसे क्षण आये ? 

ख़ुश रहना रख कायम संयम महान । 
आनंद-क्षोभ सबको कर के समान । 

न खोना कभी भी अपना संतुलन । 
न सुख में इतराना न दुख में क्रंदन । 

हर स्थिति का करना धीरज से सामना । 
सुख-दुख की अनुभूति से परे रहने की कल्पना । 

सम भाव से दोनों को स्वीकार करना । 
बन एक द्रष्टा निज कर्म करते रहना । 

आसाँ नहीं है यह मुश्किल है काम । 
जो यह कर पाये वह बन जाता महान । 

जिसे प्राप्त हो जाय यह संभावना । 
उसे करनी चाहिये प्रभु की वंदना । 

मानो उस पर हरि की कृपा महान । 
जो दे दिया उसे इक दुर्लभ वरदान । 

सरस्वती जोशी




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