हम परिवर्तित भारतवासी
कोई ज़माना था जब घर आए को रोटी देने वाला होता था सम्मानित ।
आए को भोजन देनेवाली गृहलक्ष्मी अन्नपूर्णा सम होती थी पूजित ।
किसने कितनी डिसेज़ बनाईं इसको नहीं गिना करते थे ।
जो कुछ घर में होता था निस्संकोच रखा करते थे ।
केवल बंगला-गाड़ी फर्नीचर से सम्मान नही मिलता था ।
आदर-अपनत्व उदारता से भी हर व्यक्ति तुलता था ।
"खाना खाओगे, खाना बनाऊँ ?" यह प्रश्न नहीं पूछा जाता था ।
"और रोटी लोगे ? " कह अतिथि की ओर नहीं देखा जाता था ।
थाली पर बैठे व्यक्ति को कर-कर मनुहार खिलाते थे ।
और इस थकान में प्राणी सुख का अनुभव पाते थे ।
"वापस अवश्य आइयेगा ।" सच्चे दिल से कहते थे ।
भोजन की आस में आए कोई तो उसे देख खुश होते थे ।
पर अब बदले युग ने विकसित-धनी भारत के शिक्षित व्यक्ति बना दिया।
व्यर्थ "वेस्टेज" ना करके "इकोनोमी" करना सिखा दिया ।
अब हम कदम-कदम पर सब कुछ "केल्कुलेट" करके चलते हैं ।
गणित-ज्ञाता तो वैसे भी थे अब उसको "एप्लाई" भी करते हैं ।
अपनी नाज़ुक गृहणियों को पर-स्वागत में गर्मी में हलाल क्यों करें ?
कुत्ते गायों के बाट्ये सेक-सेक, व्यर्थ मेहनत कर-कर क्यों मरें ?
अब टीवी, फ्रीज़, कार सब कुछ है पर कटोरदान को खाली रखते ।
"रोटे ठेकने" के बजाय टीवी सीरियल से हँस-हँस अपना मन-बहलाते !
हम परिवर्तित भारतवासी अब मूल्य प्राचीन-जर्जर उठा-उठा कर रहे हैं फेंक ।
सावधान हो नव भौतिकवादी नियमों को सीख रहे हैं देख-देख ।
सरस्वती जोशी
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