सवागण-दवागण / सुहागिन-दुहागिन (हिंदू नीरी के दो ही वर्ग, दो ही जातियाँ )
आज फिर एक सिंदूरी शाम आई ।
सुहागिन की सिंदूरी आभा माँग छोड़ अंबर पर छाई ।
अकेली बैठी अबला की स्मृतियों में फिर वह शाम उभर आई ।
जब उससे कहा गया : "जब उसके मन में तुम जगह नहीं कर पाईं,
तो उसको या कहो उससे तुम्हें मुक्त करने में ही है सबकी भलाई..."
मानों किसी विदेशी उपन्यास के शब्दों का कर दिया हो अनुवाद ।
जिसे पढ़ते समय अजीब सा लगा था यह सारा संवाद ।
और घंटों किया था इस विषय पर, अपनी सहेलियों से विवाद ।
पर विधि की विडंबना, वे ही शब्द बन गये, भावी जीवन की घोषणा ।
पावों की बिछिया चुभी, मंद पड़ा बिंदिया का चमकना ।
कानों में जैसे सुन पड़ा उसे चूड़ियों का चटकना ।
जीवित पति के सामने ही, पुँछता दिखा सिंदूर अपना ।
लाल चुनरी जर्जर हुई, दिखने लगा मानो अंग-अंग ।
जिसे ढकने के प्रयास में, उड़ गया चेहरे का रंग ।
आएँगे कृष्ण, बढाएँगे चीर, इस झूठी आस में ।
सहमी सिकुड़ी सी, हो निराश, आई पिता के पास में ।
भग्न हृदय के टुकड़े झोली में ले न्यायालय से बाहर आई ।
लड़खड़ाते कदमों से निकली, झुकी निगाह थी लजाई ।
सुख-सुहाग छिन गया, अब सुहागिन ना रही ।
पर कँवारी कन्या की श्रेणी से भी तो वंचित हुई ।
कन्या होती, शक्ति कहाती, नवरात्रि में पूजी जाती ।
पर परित्यक्ता तो अभागिनों की श्रेणी में ही मानी जाती ।
फिर से घर बसा ले तब भी क्या पहले सा सब हो जाएगा ?
पहली मेहँदी के रक्तिम धब्बों से क्या छुटकारा मिल पाएगा ?
माँ के घर जब पहुँची तो मैका लगा निपट पराया ।
उस घर से विदा होने का सारा दृश्य उसे फिर याद आया ।
जाने क्यों सहसा हाथ बढ़ा, रामायण को उठा लिया ।
आज करूँगी जल प्रवेश इसको यह निर्णय बना लिया ।
पर कंपित हाथों से फौरन सीने से उसे लगा लिया ।
मानो उसमें छिपी किसी सखी ने कुछ समझा दिया ।
सीता भी परित्यक्ता थी, पर पत्नी-पद फिर भी बना रहा ।
मुझको तो वह भी ना है संभव, जीवन में कुछ भी नहीं रहा ।
कितना भी जग शक्ति कह कर नत मस्तक हो कर ले पूजा ।
हिंदू नारी के जीवन का एक और भी पहलू दूजा ।
पति गृह की दासी मान स्वयं को पति को माने परमेश्वर ।
तो जग में देवी कहलाती चाहे रहे सेविका बन कर ।
जो दासीपन स्वीकार नहीं कर पत्नीपन का ज़ोर जताती ।
वह पद्मिनी या देवी से नीचे गिर सिर्फ मानवी रह जाती ।
जो निज अस्तित्व को कर विस्मित, पति-भक्ति कर कृपा न पाती ।
वह चाहे जीते न्यायालय में पर सच्चाई में मात ही खाती ।
चाहे मंद-भागिनी कहे न कोई पर भाग्यशालिनी नहीं कहाती ।
"पतिव्रता" के "टाईटल" वाली हर नारी से नीचे आ जाती ।
हिंदू नारी की ऊँच-नीच या जात-पाँत के लंबे-चोड़े विस्तार नहीं ।
संपूर्ण समाज की नारी है बस दो वर्गों में बँटी हुई ।
"अभागिन या भाग्यशालिनी", "सुहागिन या दुहागिन", "सुहागण या दुहागण",
बस यही दो वर्ग बाँटते उसको, जिनमें काटा करती जीवन ।
इनके अंदर झाँको तो "व्याख्या" मे कुछ नाम दिख जाते हैं ।
"अबीरी", "परित्यकता", "विधवा", "वंध्या"/ "निपूती" सब निम्न वर्ग में जाते हैं ।
ब्राह्मण के घर जन्मे चाहे शूद्र की कुटिया बसे, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता ।
"सबीरी", "सुहागिन", "सपूती", "सधवा" को तो धर्म-शास्त्र तक ऊपर रखता ।
"भाई", "पति" औ "पुत्र", तीन "पुरुषों" का अस्तित्व ही उसके जीवन का आधार ।
इनका अभाव हो जाए तो बस होता है उसका जीवन निस्सार ।
परंपरावादी हिंदू नारी की व्रत-साधना घूमती इन तीनों के चारों ओर ।
ना चाहे वह मुक्ति-मोक्ष कुछ, बस इतना माँगती है कर जोड़ :
"इन "तीन" से वंचित मत रखना प्रभु ! नहीं माँगती मैं कुछ और ।"
पर हम गर्व से कहते शीश उठा :
"अब तो (Bharat is changed,) भारत बदल गया है ।
आधुनिक भारत की नारी ने हर अधिकार को छीन लिया है ।
अब वह "पागल देवी" नहीं रही, है शिक्षित, उसको सब पद प्राप्त होते ।
अब सब बिलकुल वैसे ही है, जैसे लंदन-अमेरिका की नारी के हेतु वहाँ के लोग करते ।"
यह कहते समय जाने कैसे हम उसके अंतर का स्वर,
उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विस्मित कर करते तुलना !
औ उसके क्रंदन या आर्तनाद की शांत भाव से करते अवहेलना ।
नहीं देखते हैं हम या फिर नहीं देख पाते हैं उसके अंतर की वेदना ।
सरस्वती जोशी
आज फिर एक सिंदूरी शाम आई ।
सुहागिन की सिंदूरी आभा माँग छोड़ अंबर पर छाई ।
अकेली बैठी अबला की स्मृतियों में फिर वह शाम उभर आई ।
जब उससे कहा गया : "जब उसके मन में तुम जगह नहीं कर पाईं,
तो उसको या कहो उससे तुम्हें मुक्त करने में ही है सबकी भलाई..."
मानों किसी विदेशी उपन्यास के शब्दों का कर दिया हो अनुवाद ।
जिसे पढ़ते समय अजीब सा लगा था यह सारा संवाद ।
और घंटों किया था इस विषय पर, अपनी सहेलियों से विवाद ।
पर विधि की विडंबना, वे ही शब्द बन गये, भावी जीवन की घोषणा ।
पावों की बिछिया चुभी, मंद पड़ा बिंदिया का चमकना ।
कानों में जैसे सुन पड़ा उसे चूड़ियों का चटकना ।
जीवित पति के सामने ही, पुँछता दिखा सिंदूर अपना ।
लाल चुनरी जर्जर हुई, दिखने लगा मानो अंग-अंग ।
जिसे ढकने के प्रयास में, उड़ गया चेहरे का रंग ।
आएँगे कृष्ण, बढाएँगे चीर, इस झूठी आस में ।
सहमी सिकुड़ी सी, हो निराश, आई पिता के पास में ।
भग्न हृदय के टुकड़े झोली में ले न्यायालय से बाहर आई ।
लड़खड़ाते कदमों से निकली, झुकी निगाह थी लजाई ।
सुख-सुहाग छिन गया, अब सुहागिन ना रही ।
पर कँवारी कन्या की श्रेणी से भी तो वंचित हुई ।
कन्या होती, शक्ति कहाती, नवरात्रि में पूजी जाती ।
पर परित्यक्ता तो अभागिनों की श्रेणी में ही मानी जाती ।
फिर से घर बसा ले तब भी क्या पहले सा सब हो जाएगा ?
पहली मेहँदी के रक्तिम धब्बों से क्या छुटकारा मिल पाएगा ?
माँ के घर जब पहुँची तो मैका लगा निपट पराया ।
उस घर से विदा होने का सारा दृश्य उसे फिर याद आया ।
जाने क्यों सहसा हाथ बढ़ा, रामायण को उठा लिया ।
आज करूँगी जल प्रवेश इसको यह निर्णय बना लिया ।
पर कंपित हाथों से फौरन सीने से उसे लगा लिया ।
मानो उसमें छिपी किसी सखी ने कुछ समझा दिया ।
सीता भी परित्यक्ता थी, पर पत्नी-पद फिर भी बना रहा ।
मुझको तो वह भी ना है संभव, जीवन में कुछ भी नहीं रहा ।
कितना भी जग शक्ति कह कर नत मस्तक हो कर ले पूजा ।
हिंदू नारी के जीवन का एक और भी पहलू दूजा ।
पति गृह की दासी मान स्वयं को पति को माने परमेश्वर ।
तो जग में देवी कहलाती चाहे रहे सेविका बन कर ।
जो दासीपन स्वीकार नहीं कर पत्नीपन का ज़ोर जताती ।
वह पद्मिनी या देवी से नीचे गिर सिर्फ मानवी रह जाती ।
जो निज अस्तित्व को कर विस्मित, पति-भक्ति कर कृपा न पाती ।
वह चाहे जीते न्यायालय में पर सच्चाई में मात ही खाती ।
चाहे मंद-भागिनी कहे न कोई पर भाग्यशालिनी नहीं कहाती ।
"पतिव्रता" के "टाईटल" वाली हर नारी से नीचे आ जाती ।
हिंदू नारी की ऊँच-नीच या जात-पाँत के लंबे-चोड़े विस्तार नहीं ।
संपूर्ण समाज की नारी है बस दो वर्गों में बँटी हुई ।
"अभागिन या भाग्यशालिनी", "सुहागिन या दुहागिन", "सुहागण या दुहागण",
बस यही दो वर्ग बाँटते उसको, जिनमें काटा करती जीवन ।
इनके अंदर झाँको तो "व्याख्या" मे कुछ नाम दिख जाते हैं ।
"अबीरी", "परित्यकता", "विधवा", "वंध्या"/ "निपूती" सब निम्न वर्ग में जाते हैं ।
ब्राह्मण के घर जन्मे चाहे शूद्र की कुटिया बसे, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता ।
"सबीरी", "सुहागिन", "सपूती", "सधवा" को तो धर्म-शास्त्र तक ऊपर रखता ।
"भाई", "पति" औ "पुत्र", तीन "पुरुषों" का अस्तित्व ही उसके जीवन का आधार ।
इनका अभाव हो जाए तो बस होता है उसका जीवन निस्सार ।
परंपरावादी हिंदू नारी की व्रत-साधना घूमती इन तीनों के चारों ओर ।
ना चाहे वह मुक्ति-मोक्ष कुछ, बस इतना माँगती है कर जोड़ :
"इन "तीन" से वंचित मत रखना प्रभु ! नहीं माँगती मैं कुछ और ।"
पर हम गर्व से कहते शीश उठा :
"अब तो (Bharat is changed,) भारत बदल गया है ।
आधुनिक भारत की नारी ने हर अधिकार को छीन लिया है ।
अब वह "पागल देवी" नहीं रही, है शिक्षित, उसको सब पद प्राप्त होते ।
अब सब बिलकुल वैसे ही है, जैसे लंदन-अमेरिका की नारी के हेतु वहाँ के लोग करते ।"
यह कहते समय जाने कैसे हम उसके अंतर का स्वर,
उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विस्मित कर करते तुलना !
औ उसके क्रंदन या आर्तनाद की शांत भाव से करते अवहेलना ।
नहीं देखते हैं हम या फिर नहीं देख पाते हैं उसके अंतर की वेदना ।
सरस्वती जोशी
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