जीवन के तीन चरण
जीवन के तीन चरण,
प्रथम जन्म, अंतिम मरण ।
बीच का कैसा होगा न जाने,
शायद होगा युक्त हँसी-मुस्कुराहट से,
गीतों की गुनगुनाहट से,
सपनों के संसार से,
अपनों के प्यार से,
या आँसुओं की धार से ?
किसी को भी नहीं ज्ञात ।
पर सब करते हैं प्रयास ।
जीते हैं उसे सँवारने को ।
सपनों के साँचे में ढालने को ।
उससे सुंदर सी मूरत निकालने को ।
जब मूरत ढल कर आएगी ।
कैसी छबि दिखलाएगी ?
होगा कैसा उसका स्वरूप ?
इसका नहीं कुछ आभास ।
पर मन में रख कर नई आस ।
हर प्राणी बन शिल्पकार ।
उसके निर्माण में हर पल को वार ।
करता उस दिन का इंतज़ार ।
जब अंतिम चरण आएगा ।
वह भव से विदा पाएगा ।
वह मूरत तो संग जाएगी ।
पर अपना प्रभाव दिखलाएगी ।
बस उसकी ही बातें होंगी ।
उसकी छबि जैसी भी होगी,
वैसा ही यश-अपयश देगी ।
जीवन-मरण प्रभु इच्छा पर है,
पर है उससे अधिक मूल्यवान ।
मध्य का वह चरण जिसमें,
घड़ता मानव उस मूरत को,
जो है उसकी स्वनिर्मित पहचान ।
सरस्वती जोशी
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