१) (पुत्र जन्म पर ) बाजी थाली, बँटी सुहाली ! (पुत्री जन्म पर ) बाज्यो सूपड़ो, (पिता के घर में ) हुयो झूँपड़ो) ।
२) गौ अर बेटी ने जठीने टेर दे बठीने ई चल पड़े !
३) दुहागण की बेरियाँ चाँद ही आथम जावे ।
४) भैंस तो भलाँई पाड़ी लियावो, पण बहू के बेटो होणो चाईजे ।
५) मुँह से की बोले नहीं करो किसी के गेल, पराधीन दोन्यूँ सदा, जग में बेटी बैल !
कन्या की पुकार
माँ ! क्यों ना सुन पाती तू मेरी यह करुणा भरी पुकार ?
तेरे ही हाथों से होता कैसे यह निर्मम अत्याचार ?
मैं तुझसे कुछ और न चाहूँ वादा करती जोड़े हाथ !
बस इतनी सी चाह के देखूँ मैं भी जीवन का प्रभात ।
चाहूँ के सीता गौरी के पथ पर मैं भी बढ़ जाऊँ ।
शिव विष्णु को बुला धरा पर अपने तप बल से पाऊँ ।
है यह मुझको ज्ञात के मेरी विनय न तू सुन पायेगी ।
जगती के जंजाल से मोहित मेरा अस्तित्व मिटाएगी ।
फिर भी मन में कहीं छिपी आशा की किरण यही कहती है ।
जग में माता सम रक्षक ना कोई हस्ती हो सकती है ।
सरस्वती जोशी
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