गौ की पुकार !
मैं कामधेनु, सुरभि-हारोली... कितने नामों से पूजी जाती हूँ !
बेटे को बना प्रतीक धर्म का, धर्म की राह दिखाती हूँ ।
मैं प्रतीक इस पृथवी का जिस पर जन्म तुम लेते हो ।
माता या नारी का प्रतीक भी तुम मुझको ही चुनते हो ।
दान में दे करके मुझको वैतरणी तर जाते हो ।
मेरे दूध, दही, मक्खन, सब का तुम लाभ उठाते हो ।
मेरी पूजा कर-कर के मेरा आशीर्वाद पाते हो ।
मेरे शकुन ले-ले कर तुम यात्रा करने जाते हो ।
मेरा मुँह देख सभी देवों के दर्शन पाते हो ।
लेकिन मुझ पर विपत पड़े तो दूर सरक क्यों जाते हो ?
कृष्ण भूमि में गोविंद की गायें भारी पीड़ा सहती हैं ।
पर कृष्ण भक्त निद्रा में सोते नींद न उनकी जगती है ।
हे गोपाल़़़, गोविंद मुरारी ! याद तुम्हारी आती है !
हे गौ, द्विज, धेनु, देव हितकारी ! तुम्हारी गायें तुम्हें बुलाती हैं !
सरस्वती जोशी

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