Thursday, July 31, 2014

हम परिवर्तित भारतवासी

हम परिवर्तित भारतवासी 
कोई ज़माना था जब घर आए को रोटी देने वाला होता था सम्मानित । 
आए को भोजन देनेवाली गृहलक्ष्मी अन्नपूर्णा सम होती थी पूजित । 
किसने कितनी डिसेज़ बनाईं इसको नहीं गिना करते थे । 
जो कुछ घर में होता था निस्संकोच रखा करते थे । 
केवल बंगला-गाड़ी फर्नीचर से सम्मान नही मिलता था । 
आदर-अपनत्व उदारता से भी हर व्यक्ति तुलता था । 

"खाना खाओगे, खाना बनाऊँ ?" यह प्रश्न नहीं पूछा जाता था । 
"और रोटी लोगे ? " कह अतिथि की ओर नहीं देखा जाता था । 
थाली पर बैठे व्यक्ति को कर-कर मनुहार खिलाते थे । 
और इस थकान में प्राणी सुख का अनुभव पाते थे । 
"वापस अवश्य आइयेगा ।" सच्चे दिल से कहते थे । 
भोजन की आस में आए कोई तो उसे देख खुश होते थे । 

पर अब बदले युग ने विकसित-धनी भारत के शिक्षित व्यक्ति बना दिया। 
व्यर्थ "वेस्टेज" ना करके "इकोनोमी" करना सिखा दिया । 
अब हम कदम-कदम पर सब कुछ "केल्कुलेट" करके चलते हैं । 
गणित-ज्ञाता तो वैसे भी थे अब उसको "एप्लाई" भी करते हैं । 
अपनी नाज़ुक गृहणियों को पर-स्वागत में गर्मी में हलाल क्यों करें ?
कुत्ते गायों के बाट्ये सेक-सेक, व्यर्थ मेहनत कर-कर क्यों मरें ?

अब टीवी, फ्रीज़, कार सब कुछ है पर कटोरदान को खाली रखते । 
"रोटे ठेकने" के बजाय टीवी सीरियल से हँस-हँस अपना मन-बहलाते ! 
हम परिवर्तित भारतवासी अब मूल्य प्राचीन-जर्जर उठा-उठा कर रहे हैं फेंक । 
सावधान हो नव भौतिकवादी नियमों को सीख रहे हैं देख-देख । 

सरस्वती जोशी

Wednesday, July 30, 2014

सवागण-दवागण / सुहागिन-दुहागिन

सवागण-दवागण / सुहागिन-दुहागिन (हिंदू नीरी के दो ही वर्ग, दो ही जातियाँ )

आज फिर एक सिंदूरी शाम आई ।
सुहागिन की सिंदूरी आभा माँग छोड़ अंबर पर छाई ।
अकेली बैठी अबला की स्मृतियों में फिर वह शाम उभर आई ।
जब उससे कहा गया : "जब उसके मन में तुम जगह नहीं कर पाईं,
तो उसको या कहो उससे तुम्हें मुक्त करने में ही है सबकी भलाई..."
मानों किसी विदेशी उपन्यास के शब्दों का कर दिया हो अनुवाद ।
जिसे पढ़ते समय अजीब सा लगा था यह सारा संवाद ।
और घंटों किया था इस विषय पर, अपनी सहेलियों से विवाद ।
पर विधि की विडंबना, वे ही शब्द बन गये, भावी जीवन की घोषणा ।

पावों की बिछिया चुभी, मंद पड़ा बिंदिया का चमकना ।
कानों में जैसे सुन पड़ा उसे चूड़ियों का चटकना ।
जीवित पति के सामने ही, पुँछता दिखा सिंदूर अपना ।
लाल चुनरी जर्जर हुई, दिखने लगा मानो अंग-अंग ।
जिसे ढकने के प्रयास में, उड़ गया चेहरे का रंग ।
आएँगे कृष्ण, बढाएँगे चीर, इस झूठी आस में ।
सहमी सिकुड़ी सी, हो निराश, आई पिता के पास में ।
भग्न हृदय के टुकड़े झोली में ले न्यायालय से बाहर आई ।
लड़खड़ाते कदमों से निकली, झुकी निगाह थी लजाई ।

सुख-सुहाग छिन गया, अब सुहागिन ना रही ।
पर कँवारी कन्या की श्रेणी से भी तो वंचित हुई ।
कन्या होती, शक्ति कहाती, नवरात्रि में पूजी जाती ।
पर परित्यक्ता तो अभागिनों की श्रेणी में ही मानी जाती ।
फिर से घर बसा ले तब भी क्या पहले सा सब हो जाएगा ?
पहली मेहँदी के रक्तिम धब्बों से क्या छुटकारा मिल पाएगा ?
माँ के घर जब पहुँची तो मैका लगा निपट पराया ।
उस घर से विदा होने का सारा दृश्य उसे फिर याद आया ।
जाने क्यों सहसा हाथ बढ़ा, रामायण को उठा लिया ।
आज करूँगी जल प्रवेश इसको यह निर्णय बना लिया ।
पर कंपित हाथों से फौरन सीने से उसे लगा लिया ।
मानो उसमें छिपी किसी सखी ने कुछ समझा दिया ।
सीता भी परित्यक्ता थी, पर पत्नी-पद फिर भी बना रहा ।
मुझको तो वह भी ना है संभव, जीवन में कुछ भी नहीं रहा ।

कितना भी जग शक्ति कह कर नत मस्तक हो कर ले पूजा ।
हिंदू नारी के जीवन का एक और भी पहलू दूजा ।
पति गृह की दासी मान स्वयं को पति को माने परमेश्वर ।
तो जग में देवी कहलाती चाहे रहे सेविका बन कर ।
जो दासीपन स्वीकार नहीं कर पत्नीपन का ज़ोर जताती ।
वह पद्मिनी या देवी से नीचे गिर सिर्फ मानवी रह जाती ।
जो निज अस्तित्व को कर विस्मित, पति-भक्ति कर कृपा न पाती ।
वह चाहे जीते न्यायालय में पर सच्चाई में मात ही खाती ।
चाहे मंद-भागिनी कहे न कोई पर भाग्यशालिनी नहीं कहाती ।
"पतिव्रता" के "टाईटल" वाली हर नारी से नीचे आ जाती ।
हिंदू नारी की ऊँच-नीच या जात-पाँत के लंबे-चोड़े विस्तार नहीं ।
संपूर्ण समाज की नारी है बस दो वर्गों में बँटी हुई ।
"अभागिन या भाग्यशालिनी", "सुहागिन या दुहागिन", "सुहागण या दुहागण",
बस यही दो वर्ग बाँटते उसको, जिनमें काटा करती जीवन ।
इनके अंदर झाँको तो "व्याख्या" मे कुछ नाम दिख जाते हैं ।
"अबीरी", "परित्यकता", "विधवा", "वंध्या"/ "निपूती" सब निम्न वर्ग में जाते हैं ।
ब्राह्मण के घर जन्मे चाहे शूद्र की कुटिया बसे, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता ।
"सबीरी", "सुहागिन", "सपूती", "सधवा" को तो धर्म-शास्त्र तक ऊपर रखता ।
"भाई", "पति" औ "पुत्र", तीन "पुरुषों" का अस्तित्व ही उसके जीवन का आधार ।
इनका अभाव हो जाए तो बस होता है उसका जीवन निस्सार ।

परंपरावादी हिंदू नारी की व्रत-साधना घूमती इन तीनों के चारों ओर ।
ना चाहे वह मुक्ति-मोक्ष कुछ, बस इतना माँगती है कर जोड़ :
"इन "तीन" से वंचित मत रखना प्रभु ! नहीं माँगती मैं कुछ और ।"

पर हम गर्व से कहते शीश उठा :
"अब तो (Bharat is changed,) भारत बदल गया है ।
आधुनिक भारत की नारी ने हर अधिकार को छीन लिया है ।
अब वह "पागल देवी" नहीं रही, है शिक्षित, उसको सब पद प्राप्त होते ।
अब सब बिलकुल वैसे ही है, जैसे लंदन-अमेरिका की नारी के हेतु वहाँ के लोग करते ।"
यह कहते समय जाने कैसे हम उसके अंतर का स्वर,
उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विस्मित कर करते तुलना !
औ उसके क्रंदन या आर्तनाद की शांत भाव से करते अवहेलना ।
नहीं देखते हैं हम या फिर नहीं देख पाते हैं उसके अंतर की वेदना ।

सरस्वती जोशी

Monday, July 28, 2014

चाय की प्याली

चाय की प्याली 
गर विश्व एकता का हम कोई पक्का सा प्रतीक विचारें । 
जिसको सब धर्मी मिल कर निर्विरोध हो कर स्वीकारें । 
जिसके मंदिर कदम-कदम पर निर्विवाद खुलते जाएँ । 
सब धर्मों व सभी जातियों के हो प्रसन्न भीतर को जाएँ । 
मन प्रसन्न हो जाए सब का खुश हो- हो कर भेंट चढ़ाएँ । 
खिले-खिले चेहरों से सब ही बन फुर्तीले बाहर आएँ । 
इससे ही दिन उगता सब का इससे ही होती है शाम । 
चाहे व्रत-उपवास करें पर चाय बिना ना चलता काम ।
इतने विभिन्न स्वाद भरे हैं, लगती सदा गुणों की खान । 
इसे अगर ना पेश करो तो रहे अधूरा अतिथि सम्मान । 
कृष्ण कन्हैया भी आएँ तो भूलेंगे अब माखन-मिश्री, 
लेंगे पहले चाय का नाम ? 

सरस्वती जोशी

जीवन के तीन चरण

जीवन के तीन चरण

जीवन के तीन चरण, 
प्रथम जन्म, अंतिम मरण ।
बीच का कैसा होगा न जाने, 
शायद होगा युक्त हँसी-मुस्कुराहट से, 
गीतों की गुनगुनाहट से, 
सपनों के संसार से, 
अपनों के प्यार से, 
या आँसुओं की धार से ?
किसी को भी नहीं ज्ञात ।
पर सब करते हैं प्रयास ।
जीते हैं उसे सँवारने को ।
सपनों के साँचे में ढालने को ।
उससे सुंदर सी मूरत निकालने को । 

जब मूरत ढल कर आएगी ।
कैसी छबि दिखलाएगी ?
होगा कैसा उसका स्वरूप ?
इसका नहीं कुछ आभास ।
पर मन में रख कर नई आस ।
हर प्राणी बन शिल्पकार ।
उसके निर्माण में हर पल को वार । 
करता उस दिन का इंतज़ार ।

जब अंतिम चरण आएगा ।
वह भव से विदा पाएगा ।
वह मूरत तो संग जाएगी ।
पर अपना प्रभाव दिखलाएगी ।
बस उसकी ही बातें होंगी ।
उसकी छबि जैसी भी होगी,
वैसा ही यश-अपयश देगी ।
जीवन-मरण प्रभु इच्छा पर है,
पर है उससे अधिक मूल्यवान ।
मध्य का वह चरण जिसमें,
घड़ता मानव उस मूरत को,
जो है उसकी स्वनिर्मित पहचान ।

सरस्वती जोशी

Sunday, July 20, 2014

संध्या का जीवन




अविवाहिताओं द्वारा मनवाँछित पति, उदार सास, अच्छी ससुराल, मैके तथा भाई के सुख की प्राप्ति हेतु श्राद्ध पक्ष में १६ दिन तक पूजित देवी संध्या के जीवन की एक झलक ! 
संध्या केवल देवी नहीं हर कन्या की सहेली व बहन है, तथा हर घर की बहन-बेटी / कन्या का प्रतिनिधित्व भी करती है । इसके थापे तथा किला कोट डा० साधना जोशी-सुखवाल ने कनाडा में छपी एक पत्रिका में छापे थे, तथा श्री सुरेशजी ने उन्हें SNT में भी लगाया था !



संध्या का जीवन



सावन में भी पतझड़ सी सूनी शाम । 
ससुराल का छोटा सा गाँव । 
जा खेतों के पास नंगे ही पाँव । 
पथिक-हीन, वाहन विहीन, 
क्षितिज तक फैली लंबी राह । 
किसी खेत की अध-सूखी सी,
लंबी-सी खजूर के तले, सहमी सी,
तने से लिपटी खड़ी,
परम सुंदरी, भोली संध्या, 
अनमनी, उदास, देखती बाट ।
होती निराश बार बार । 
फिर भी बुनती आशा के तार ।
जा नित्य पथ लेती निहार ।




"मैके को जाती पगडंडियें पर खड़ी,
दूर-दूर तक देखती रहूँ ?
हाँ ! क्यों नहीं ! 
क्या पता आ जाय सुध, 
मेरी बिछुड़ी भौजाई को ।
माँ की आँख फरक जाए, 
वह भेजे लेने भाई को ।
किसी सहेली को तीजों के,
झूलों में ही आएँ याद ।
वे गीत जो मैं गाया करती थी, 
जिनमें करती थी फरियाद :
"माँ ! मुझको नहीं भुला देना !
भैया को भेज बुला लेना..."
आ गई संध्या की बेला ! 
पंछी लौट के घर को आए ।
अब न यहाँ कोई आएगा,
क्यों बैठी हूँ आस लगाए ?
कुछ पल और देख लूँ बाट ?
या पति के घर लौट जाऊँ ?
फिर से अपना वही नित्य का,
गृहणी का धर्म निभाऊँ ?"




लगा अगले दिन की आस,
लौट आती पति के द्वार ।
खाती थी नित्य सास की मार ।
सिर की फटी चूँदड़ तार-तार ।
पति भी तो नहीं मिला उदार ।
सोचती वह बार-बार :
"भाई न मुझे भुला पायेगा ।
इक दिन वह यहाँ आएगा ।
सिर पर धरेगा स्नेह का हाथ ।
बैठेगा कुछ देर साथ ।
मेरे कष्ट देख द्रवित हो कर,
आँसू की कर देगा बरसात ।
करुणा के दो बोल बोल कर,
मेरी पीड़ा करेगा शांत ।
कोई तो है दुख का साथी,
यह विश्वास जगा जाएगा ।
घर तो मुझे लौटना होगा,
पर दुखियारापन घट जाएगा ।
कटु शब्दो की बौछारें तो,
मिलना बंद नहीं होगा ।
जो नियति मिली है मुझे देव से,
उसको तो सहना ही होगा ।




यूँ नियति की कृपा की आस में,
मैके के प्रति जमे विश्वास में,
शामें आती रहीं, जाती रहीं ।
संध्या अटल बनी सी अपनी,
परंपराओं को निभाती रही ।
पर उसके जीवन की पीर,
सह न सका कोमल शरीर ।
और भव की उस पीड़ा से,
मुक्त हो गया उसका तन ।
विदा हो गई इस जगती से,
तोड़ रिश्तों के सब बंधन ।




मैके में समाचार आया ।
तो सब का मन भर आया ।
कैसे मन मजबूत बना कर,
नारी का कर्तव्य सिखाया !
कैसे बन कठोर समझाया :
"पतिगृह ही स्वर्ग तुम्हारा संध्या !
तुम परधन थीं, यह भूल न जाना !
खड़ी गई थीं तु उस घर में, 
बस आड़ी ही बाहर आना... "
और नारी-हृदय इस
अन्याय को ना सह पाया ।
हर सहेली ने संध्या की,
भूल उसकी "बलाई" जात को,
विस्मित कर जात-पाँत को,
मान कर देवी उसे, 
हर घर के बाहर कर चित्रित,
संध्या का थापा बनाया ।
श्रद्धा से कर के पूजन, 
बार-बार कर के वंदन ।
गा-गा कर उसका करुण जीवन,
श्रद्धांजलि दे किया नमन ।
एक नहीं पूरे सोलह दिन ।



सरस्वती जोशी

Thursday, July 17, 2014

वह सुनहरा बचपन

वह सुनहरा बचपन
यह बात पुरानी है । 
बचपन की याद सुहानी है ।

सर्दी, गर्मी, बरसात हो । 
उजियाली-अँधेरी रात हो ।

हमें किसी से मतलब नहीं था । 
जीने का कोई मकसद नहीं था ।

माँ को ख़ुश रखें बस उसका स्नेह पायें । 
खायें-पियें औ मस्त सो जाएँ ।

स्कूल तो जाएँ पर कैसे भी अंक आएँ । 
बस कक्षा में अगली जा बैठ जाएँ ।

घर में बिजली या नल आएँ न आएँ । 
कोई चुनाव जीते या हार जाए ।

हमें न था इससे कुछ भी लेना देना । 
पर ध्यान रखते थे न टूटे खिलौना ।

औक़ात की सुध भूल सजाते थे सपने । 
चाँद को भी मान लेते थे हाथों में अपने ।

कितने सजल-सुंदर थे वे चंद दिन ! 
आज भी मुस्कुराते हैं उन्हें गिन-गिन ।

वे सुनहरे क्षण चाहे न लौट आएँ । 
पर संभव नहीं यह कि हम उन्हें भूल जाएँ ।

सरस्वती जोशी

Tuesday, July 15, 2014

क्रंदन


क्रंदन 


यह केवल आवाज़ नहीं, मेरे अंतर का स्वर है यह । 
उर के अंतर में बहता खारा एक समंदर है यह ।
नित्य उठता ज्वार इसमें, और थम जाता है फिर से,
नित्य उठती और गिरती लहर का क्रंदन है यह ।


उमड़ उठते बादलों की है कहीं काली घटा सी,
उस अँधेरे से घिरा, आता हुआ अंधड़ है यह ।
था कभी पावन, सुगंधित और शीतल जो रहा,
आज ठंडी रात में जलता हुआ चंदन है यह ।
यह केवल आवाज़ नहीं, मेरे अंतर का स्वर है यह । 


सरस्वती जोशी

समाज क्या कहेगा !

समाज क्या कहेगा !

प्रभु ने ख़ुश हो मानव बनाया !
कितने गुणों से उसे सजाया !
पर मानव ने समाज बना़या ।
मन मंदिर में उसे बिठाया ।

और भला वह क्यों ना करता ?
भगवान भरोसे कब तक रहता ?
वह प्रभु जो मूरत में छिपता । 
लाख प्रयत्न करें ना दिखता । 

पर समाज से सब कुछ मिलता ।
उस में ही वह बेटी ब्याहता । 
बहू भी समाज से लाता । 
उससे अपना वंश बढ़ाता । 

मान-सम्मान वही़ीं है पाता । 
वही तो उँचे पद दिलवाता ।
कैसे भी लक्ष्मी को लाओ ।
कोई भी साधन अपनाओ ।

बस तुम लक्ष्मी-पति बन जाओ । 
मन खोल उसकी रस्में निभाओ । 
जो उनका पालन ना कर पाओ ।
तो चुप-चुप आसन से उठ जाओ ।

अपनी सीमा लो पहचान !
सीमा सम होगा सम्मान !
कैसे भला मान गँवाएँ ?
कैसे नीचे बैठ जाएँ ?

लोग इसे तो समझ न पाते ।
"समाज क्या कहेगा ?" यूँ दोहराते ।
जैसे समाज से डरना भूल ! 
देख इसे चुभता है शूल ।

कहते : "देखो ! प्रभु से डरना !
जो वह चाहे सो ही करना !"
अरे प्रभु कौन भाग जायगा ?
जब बुलाओ आ ही जायगा ।

अंतिम साँस में भी पुकारो ।
एक दो आवाज़ें मारो ।
भोला- भाला दौड़ आयगा।
नाव पार करके ही जायगा ।

पर समज की बात है न्यारी ।
उससे निभानी रिश्तेदारी ।
सो मित्रो ! यह भय सदा रहेगा ।
"ध्यान रखना ! समाज क्या कहेगा !"

सरस्वती जोशी
मैंने "लोग" नहीं लिखा और "समाज" लिखा है, क्योंकि उस हालत में केवल पुरुषों पर आरोप लगता, लुगाइयाँ बच जातीं ।

Monday, July 14, 2014

वह सुनहरा बचपन

वह सुनहरा बचपन 

यह बात पुरानी है । 
बचपन की याद सुहानी है । 

सर्दी, गर्मी, बरसात हो । 
उजियाली-अँधेरी रात हो । 

हमें किसी से मतलब नहीं था । 
जीने का कोई मकसद नहीं था । 

माँ को ख़ुश रखें बस उसका स्नेह पायें । 
खायें-पियें औ मस्त सो जाएँ । 

स्कूल तो जाएँ पर कैसे भी अंक आएँ । 
बस कक्षा में अगली जा बैठ जाएँ । 

घर में बिजली या नल आएँ न आएँ । 
कोई चुनाव जीते या हार जाए । 

हमें न था इससे कुछ भी लेना देना । 
पर ध्यान रखते थे न टूटे खिलौना । 

औक़ात की सुध भूल सजाते थे सपने । 
चाँद को भी मान लेते थे हाथों में अपने । 

कितने सजल-सुंदर थे वे चंद दिन ! 
आज भी मुस्कुराते हैं उन्हें गिन-गिन । 

वे सुनहरे क्षण चाहे न लौट आएँ । 
पर संभव नहीं यह कि हम उन्हें भूल जाएँ । 

सरस्वती जोशी

जीवन के विभिन्न पहलू



जीवन के विभिन्न पहलू

हर बार जब जीवन के ऐसे पहलू सामने हैं आते । 
तो फिर ताज, महल, मीनारों़ का सार समझ ना हम पाते ।


मानव अपने जीवन का क्या बस यही अर्थ समझ पाया ? 
भूखे को रोटी, नंगे को वसन तक उपलब्ध नहीं वह कर पाया ।

पर गर्व उसे के वह चाँद तलक पर जा कर दर्शन कर आया । 
स्व निर्मित यंत्रों से जा कर शनि-गुरु तक छू आया ।

बादलों को फोड़-फोड़ पानी बरसाना सीख लिया । 
ईश्वर भी रह जाय चकित वह सब करना है सीख लिया ।

गर इस धरती पर फिरभी कुछ भूखे-नंगे फिरते हैं । 
"तो यह उनके कर्मों का फल,..." गीता के कृष्ण तक कहते हैं ।

"जैसी करनी वैसी भरनी... कर्म-फल मिटाना मुश्किल । 
सुख देना उनको नहीं सरल,... यह तो उनकी करनी का फल ।..."

सोच : "यही प्रभु की इच्छा, " कर लेते हल्का मन का भार । 
"पत्थर तक अपनी किस्मत लाता,... इसीको कहते हैं संसार !..."

सरस्वती जोशी

Sunday, July 13, 2014

कन्या की पुकार

१) (पुत्र जन्म पर ) बाजी थाली, बँटी सुहाली ! (पुत्री जन्म पर ) बाज्यो सूपड़ो, (पिता के घर में ) हुयो झूँपड़ो) ।
 २) गौ अर बेटी ने जठीने टेर दे बठीने ई चल पड़े !
 ३) दुहागण की बेरियाँ चाँद ही आथम जावे ।
 ४) भैंस तो भलाँई पाड़ी लियावो, पण बहू के बेटो होणो चाईजे ।
 ५) मुँह से की बोले नहीं करो किसी के गेल, पराधीन दोन्यूँ सदा, जग में बेटी बैल !
कन्या की पुकार
माँ ! क्यों ना सुन पाती तू मेरी यह करुणा भरी पुकार ? 
तेरे ही हाथों से होता कैसे यह निर्मम अत्याचार ?

मैं तुझसे कुछ और न चाहूँ वादा करती जोड़े हाथ !
बस इतनी सी चाह के देखूँ मैं भी जीवन का प्रभात ।

चाहूँ के सीता गौरी के पथ पर मैं भी बढ़ जाऊँ ।
शिव विष्णु को बुला धरा पर अपने तप बल से पाऊँ ।

है यह मुझको ज्ञात के मेरी विनय न तू सुन पायेगी ।
जगती के जंजाल से मोहित मेरा अस्तित्व मिटाएगी ।

फिर भी मन में कहीं छिपी आशा की किरण यही कहती है ।
जग में माता सम रक्षक ना कोई हस्ती हो सकती है ।

सरस्वती जोशी

Wednesday, July 9, 2014

तन्हाई



तन्हाई

तन्हाई से हमें कुछ ऐसा है प्यार,
कि हम सरलता से मित्र बनाते नहीं हैं । 
लेकिन जब मान लेते हैं मित्र किसी को,
तो फिर उससे हाथ छुड़ाते नहीं हैं ।


हालाँके जीवन ने सिखाया बार-बार,
कि लोग जीवन भर रिश्ते निभाते नहीं हैं । 
और उनकी बेरुखी का अहसास जब दिल तोड़ता है,
तो घाव आसानी से भर पाते नहीं हैं !

वैसे गर जिंदगी भर के लिये मित्र बनाने का मन हो । 
तो मीरा या सूर सा सुंदर चयन हो । 
मित्र ऐसा निलेगा कि मन मोह लेगा । 
इह लोक-पर लोक सुधार देगा !

सरस्वती जोशी

Tuesday, July 8, 2014

माला जपना तो उतना ज़रूरी नहीं ।

माला जपना तो उतना ज़रूरी नहीं । 
पर हथियार उठाना भी हितकारी नहीं । 

क्या तलवारें राम-रावण युद्ध में कल्याणकारी रहीं । 
काश रावण सीख सुन कर ही हो जाता सही । 

सीता को लौटा अपने कुल को बचाता । 
सीता के शेष जीवन में भी न तूफान आता । 

डाकू हो कर भी रत्नाकर निकला समझदार । 
संतों की बात मान उसने त्यागे हथियार । 

बन के संत वाल्मिकि आश्रम बसाया । 
सीता से दुखियों का कष्ट मिटाया । 

राम-कथा का अमर काव्य रचाया । 
राम के जीवन का सत्य सुनाया । 

जीवन पथ पार करने का मार्ग बताया ।
कितनों को भव से पार कराया ।

सरस्वती जोशी

मुस्कुराहट के चार पल ।

सच्ची-सरल हँसी-मुस्कुराहट के चार पल । 
सुंदर-सुहने, सजल-सजल । 
जिन्हें ढूँढते सब सदा ही प्रति पल । 

सोच कर कि इन्हें पाना है सरल । 
रखते सब पाने की इच्छा प्रबल । 

किंतु क्या "राम" कभी खुल कर हँस पाये ? 
क्या सीता के जीवन में ऐसे क्षण आये ? 

ख़ुश रहना रख कायम संयम महान । 
आनंद-क्षोभ सबको कर के समान । 

न खोना कभी भी अपना संतुलन । 
न सुख में इतराना न दुख में क्रंदन । 

हर स्थिति का करना धीरज से सामना । 
सुख-दुख की अनुभूति से परे रहने की कल्पना । 

सम भाव से दोनों को स्वीकार करना । 
बन एक द्रष्टा निज कर्म करते रहना । 

आसाँ नहीं है यह मुश्किल है काम । 
जो यह कर पाये वह बन जाता महान । 

जिसे प्राप्त हो जाय यह संभावना । 
उसे करनी चाहिये प्रभु की वंदना । 

मानो उस पर हरि की कृपा महान । 
जो दे दिया उसे इक दुर्लभ वरदान । 

सरस्वती जोशी




Friday, July 4, 2014

बारिश में भीगे वे बचपन के कुछ पल !



बारिश में भीगे वे बचपन के कुछ पल !

देखो तस्वीर के इन लम्हों को करो ज़रा ग़ौर ! 
कौन है ऐसा जिसे दिखेगा कोई और ? 
हरेक इसमें कहीं ख़ुद को छिपा पाएगा । 
और उसे अपना बचपन याद आएगा ।


कभी स्कूल से आते, कभी बाज़ार जाते । 
कभी खेतों में, खलिहानों में, 
कभी घर के पास के गलियारों में । 
वे बेफिक्री से बीते, बारिश में भीगे । 
हँसी-ख़ुशी के कुछ पल, थे कितने सुंदर सजल !

सुंदर भोले से सपनों से गये वे सब बीत । 
इस व्यस्त जीवन के बन गये अतीत ! 
पर आज भी याद आते हैं बार-बार ! 
कर देते हैं मानस में ख़ुशियों का संचार !

सरस्वती जोशी

Thursday, July 3, 2014

गौ की पुकार !



गौ की पुकार !

मैं कामधेनु, सुरभि-हारोली... कितने नामों से पूजी जाती हूँ ! 
बेटे को बना प्रतीक धर्म का, धर्म की राह दिखाती हूँ ।


मैं प्रतीक इस पृथवी का जिस पर जन्म तुम लेते हो । 
माता या नारी का प्रतीक भी तुम मुझको ही चुनते हो ।

दान में दे करके मुझको वैतरणी तर जाते हो । 
मेरे दूध, दही, मक्खन, सब का तुम लाभ उठाते हो ।

मेरी पूजा कर-कर के मेरा आशीर्वाद पाते हो । 
मेरे शकुन ले-ले कर तुम यात्रा करने जाते हो ।

मेरा मुँह देख सभी देवों के दर्शन पाते हो । 
लेकिन मुझ पर विपत पड़े तो दूर सरक क्यों जाते हो ?

कृष्ण भूमि में गोविंद की गायें भारी पीड़ा सहती हैं । 
पर कृष्ण भक्त निद्रा में सोते नींद न उनकी जगती है ।

हे गोपाल़़़, गोविंद मुरारी ! याद तुम्हारी आती है ! 
हे गौ, द्विज, धेनु, देव हितकारी ! तुम्हारी गायें तुम्हें बुलाती हैं !

सरस्वती जोशी

Wednesday, July 2, 2014

सरलता से मित्र बनाते नहीं हैं ।

तन्हाई से हमें कुछ ऐसा है प्यार
 कि हम सरलता से मित्र बनाते नहीं हैं ।
 लेकिन जब मान लेते हैं मित्र किसी को
 तो फिर उससे हाथ छुड़ाते नहीं हैं ।
 हालाँके जीवन ने सिखाया बार-बार
 कि लोग जीवन भर रिश्ते निभाते नहीं हैं । 
और उनकी बेरुखी का अहसास जब दिल तोड़ता है
 तो घाव आसानी से भर पाते नहीं हैं ! 
वैसे गर जिंदगी भर के लिये मित्र बनाने का मन हो ।
 तो मीरा या सूर सा सुंदर चयन हो 
। मित्र ऐसा निलेगा कि मन मोह लेगा ।
 इह लोक-पर लोक सुधार देगा !

सरस्वती जोशी