Sunday, August 31, 2014

पर्वत-नदी-सागर

पर्वत-नदी-सागर
(पिता-पुत्री-दामाद)

तू मेरे उर से निकली,
मेरे प्राणों की थी आधार ।
चाहा तुझे बाँध कर रखना,
पर तुझे नहीं था यह स्वीकार ।

जाने कैसे दूर बसे उस,
सागर ने तुझको भरमाया ।
जब मैंने यह महसूस किया तो, 
मन तुझे रोकने को अकुलाया ।

पर तू तोड़ शिला खंडों को,
निकली, अवरोहण की ठानी ।
मुक्त वेग से इठलाती सी,
उर में भरा स्नेह का पानी ।

पथ की बाधा से टकराती,
सागर प्रेम में लीन मदमाती ।
तोड़ सभी से मोह का नाता,
तू चली छोड़ सब संगी साथी ।

पहुँच पायगी युग या पल में, 
तुझको इसका कहाँ होश था !
बस सागर तक जाऊँगी मैं,
मन में इसका जोश भरा था ।

गर कोई बाधा बन आया, 
पल में उसको दूर किया ।
जगती तुझको रोक न पाई,
गर्व सभी का चूर किया ।

प्रिय मिलन की बेला जब आई,
प्रेम-रस में तू थी भरमाई ।
जा लिपटी सागर से ऐसे,
बस फिर कभी नज़र ना आई ।

माना के भर कर आलिंगन में, 
उसने तुझको अपना लिया ।
पर बदले में उसने तेरा, 
अपना अस्तित्व ही मिटा दिया ।

बदल गई उस दिन से तू बस, 
नहीं रही कोई पहचान ।
लुप्त हो गई सागर-जल बन,
रहा न कोई नामो निशान ।

पूर्ण समर्पण की मिसाल तू,
योगी सी अंतर्ध्यान हुई ।
पर शायद कुछ स्मृतियाँ मन में,
मैके की फिर भी बनी रहीं ।

प्रेम-साधना में डूबी तू , 
बढ़ चली अपने लक्ष्य की ओर । 
तोड़ के मुझसे सारे रिश्ते, 
हो कर के बस प्रेम-विभोर ।

पर मेरे इस व्याकुल मन की, 
तड़प अचानक समझ में आई । 
और मेरे सरल स्नेह को, 
तू ठुकराने से घबराई ।

इसी लिये जब मेरी आँखें,
यादों में तरसा करती हैं ।
तेरे वाष्प-कणों को ला कर,
बदली यहाँ बरसा करती है ।

और समझ जाता मेरा मन,
जब भी यहाँ वर्षा होती है ।
तू समय-समय पर ध्यान रख,
कुछ स्नेह कण भेजा करती है ।

सरस्वती जोशी

Tuesday, August 26, 2014

गुलाब और काँटे

गुलाब और काँटे
गुलाब की नियति है,
काँटों के साथ में रहना । 
विपरीत गुणों से युक्त साथी को,
कदम-कदम पर सहना ।

ज्ञात है उसे कि वे,
चुभे बिना ना रह पाएँगे ।
उनका अपना जो स्वभाव है, 
वे छोड़ न उसको पाएँगे ।

पीड़ा पहुँचा कर औरों को,
वे सुख का अनुभव करते हैं ।
प्रभु ने गुलाब के साथ बसाया, 
पर वे हरदम उससे जलते हैं ।

उन्हें गुलाब का सुंदर सौरभ,
कभी रास नहीं आता ।
औ गुलाब बिन सौरभ फैलाए,
कभी नहीं रह पाता ।

बस में है ना उसके,
अपनी नियति को बदल देना ।
पर उसने सीख लिया कैसे,
अपने हित की रक्षा करना ।

अनगिन काँटों से घिर कर भी,
कंटक मय ना बनना ।
कैसे खल से ले कर दूरी,
अंतर में सिमटे रहना ।
औ फैला अपना सुखमय सौरभ,
सबको ही हर्षित करना ।

सरस्वती जोशी

अनजान ेश, सुनसान राहें !

अनजान ेश, सुनसान राहें ! अकेले हम, संग भूली बिसरी यादें !
साधना जोशी-सुखवाल
जिस देश ने अपनत्व दिया,
वह अनजाना नहीं हो सकता ।
उससे कहीं नाता पुराना,
वह बिल्कुल वीराना/बेगाना नहीं हो सकता ।
दिशा हीन जीवन को दिशा दिखाई जिन राहों ने,
वह पथ इतना तो सुनसान नहीं हो सकता ।
गर भूली-बिसरी ही सही पर यादें साथ में रहती हैंं,
तो फिर वह राही कभी निपट अकेला नहीं हो सकता ।
ज़रा सी सोच को बदल कर देखोगे अलग निगाहों से,
तो सच कहते हैं ऐ साथी ! पग-पग पर पाओगे के,
प्रभु से पाया है जो कुछ उसमें चाहे हो खट्टा-मीठा,
पर उसके अहसान से यह जीवन उरिण कभी नहीं हो सकता ।
सरस्वती जोशी

ज़माना "अबला" कहता है,

ज़माना "अबला" कहता है,
शायद ज़माने की यही चाहत हो ।
कब किसने चाहा भला,
कि नारी में भी क्षमता हो ?

सदा नत मस्तक हो कर रहे,
क्या नहीं यह सब की मनो-कामना ?
वह बात अलग नारी ना समझे,
जग के अंतर की भावना ।

सच में तो नारी ने स्वयं सदा ही,
अपनी शक्ति को पहचाना है ।
जब भी जग ने उसके मधुर रूप को,
उसकी दुर्बलता कर माना है ।
तब-तब बन दुर्गा-चंडी,
वह दुष्टों का वध कर देती है ।
वह बात अलग वह माँ के स्वरूप को,
अधिक मान्यता दे देती है ।

वात्सल्य भाव की कोमलता में,
डूब सभी कुछ सह लेती है ।
सृजन हेतु आई है जग में,
सदा याद यह रखती है ।

इसीलिये पीड़ा सहकर भी,
कई बार चुप रहती है ।
लेकिन उसके हर स्वरूप में,
भीतर इक अलग रूप भी रखती है ।

जिसकी प्रबल शक्ति के आगे,
जग कर्ता तक डरता है ।
वह भी उसको जगदंबा कह,
झुक कर प्रणाम तक करता है ।

शायद इसीलिये नारी-उर में,
भरे उसने क्षमा-करुणा-वात्सल्य के भाव ।
और वह सह लेती पीड़ा,
बिना किये विद्रोह की चाह ।

सरस्वती जोशी

आशा के वे क्षण !

आशा के वे क्षण !
जीवन में वैसे भी ज़्यादा तो कुछ मिला नहीं था, 
पर हे मालिक ! जो कुछ थोड़े से करुणा के कण,
भूले से शायद बाँट दिये थे यूँ ही अनजाने में, बे मन,
ले लिये वापस उन्हें, पूरी तरह कठोर सा बन, 
क्या कमी करुणा की तुझको ऐसी आन पड़ी मन-मोहन ?

बड़ी आस बाँधी थी तुझ से जब तू थोड़ा सा पिघला था,
तेरा दिव्य प्रकाश जैसे अँधियारे घर में भी फैला था ।
सर पर आशीर्वाद भरा इक हाथ रख दिया हो मानों,
उर में इक विश्वास जगा जो थाम रहा था हर क्रंदन !

भय बस थी कुछ कमी शक्ति की, फिर भी कायम थे कुछ सपने,
बढ़ने का उत्साह जगा था, चमकी कुछ आशा की किरणें, 
लगता था : "है कोई मेरा," चाहे छोड़ें मझधार सभी अपने, 
पर जाने क्यों तूफान भेज, मिटा दिये आशा के वे क्षण !

सरस्वती जोशी

Sunday, August 24, 2014

Saraswati Joshi बेटी

Saraswati Joshi बेटी 
मानलो के बेटी घर की न पारस है़, न ही मान । 
न पूजा, न ही विधाता, न किसी घर का गुमान । 
वह तो है बस इस समाज में केवल खर्चे का भंडार । 
जो आती इस धरा पर बन कर अपने ही पिता पर भार । 
पर बेटी है किसी घर की तो लक्ष्मी, सृष्टि की रचना का आधार ।
जिसके बिना होगा जग सूना, मिट जाएगा यह सुंदर संसार !
बेटी या कन्या ही बनती माँ, भाभी, या किसी की बहन ।
प्रेम क्षेत्र में लीला करती सीता, राधिका, रुक्मिणी बन ।
शक्ति है वह इस जगती की रक्षा कर हरती सबके शूल ।
हो निर्मम उसका वध करना है यह कितनी भारी भूल ।
एक दिन जब महत्व उसका जग की समझ में आएगा ।
गर समय निकल गया हाथ से तो हर मानव पछताएगा ।
सरस्वती जोशी

Saturday, August 23, 2014

ये अधूरे सपनों के ढेर !

ये अधूरे सपनों के ढेर !
ये अधूरे सपनों के ढेर !
सिसक-सिसक कर पूछ रहे हैं ।
हम कभी साकार होंगे ?
या हस्ती ही मिट जायेगी ?
क्या कभी वसंत की कोयल,
आ कर गीत यहाँ गाएगी ?
कब कैसे ये जगे यहाँ पर ?
याद नहीं कुछ भी आता है ।
पर बन कर निर्मम मेरा मन,
इन्हें मिटा नहीं पाता है ।
हर बार जब तूलिका मेरी,
पतझड़ की कल्पना लाती है ।
तो ध्यान किसी का रोक लेता,
वसंत सी ही छबि बन जाती है ।
पर उस छबि में सदा कहीं कुछ,
थोड़ी कमी रह ही जाती है ।
औ निज को पा पूरा करने में अक्षम,
उर में कसक सी उठ आती है ।
पर बार-बार तेरी आशा ले,
हर आह मुझे समझाती है :
"विश्वास रख जग के पालक पर,
उसको सुध सब की आती है ।"
सरस्वती जोशी

Thursday, August 21, 2014

हम व्यस्त आधुनिक सुशिक्षितगण !

हम व्यस्त आधुनिक सुशिक्षितगण !
हम व्यस्त आधुनिक सुशिक्षितगण !
प्रबल बुद्धिपक्ष नहीं भावुक मन !
किसी के घर पर खुशियों की,
लाटरी खुले तो पागल बन कर,
उत्सव कर-कर, रात-रात भर,
चिल्ला-चिल्ला, गीत गा कर,
मस्ती से झूम, जग को जगा कर,
ख़ुशियाँ मनाएँ, बाजे बजा कर,
हाहा-हीही करें इठला कर !
नहीं ! अब हर घटना हमको,
बस इक सीमा तक ही छू पाती है ।
या किसी के भी निधन पर,
सब को सुनाएँ विलाप कर-कर !
रोते रहें भें-भें कर-कर !
हमने संतुलित प्राणी बन कर !
इन सब को गँवारपन मान कर !
त्याग अब प्राचीन जर्जर !
मिटा दिया कानून बना कर !
अब ये व्यर्थ बातें हमारी,
रातें नहीं ले पाती हैं ।
ना व्यर्थ अश्रुपात कर,
ना व्यर्थ का विलाप कर,
दुख पी जाते कठोर बन कर,
भावों के बहते दरिया से,
आँखें मचल जाएँ बहक कर,
जो तुलें भेद खोलने पर,
तो चश्मा धूप का लगा कर,
मन के भाव मन में छिपा कर,
इस तरह कंट्रोल करते,
कि जगती जान नहीं पाती है ।
कोई हँसे हँसता रहे ।
किसी का दिल रोए रोता रहे।
किसी का दिल दुखे दुखता रहे ।
कोई जिए जीता रहे, मरे मरता रहे ।
औरों के दुख, उनकी रुलाई,
उन सब में परनिंदा समाई ।
सो ना हम पराई बात सुनते ।
ना अपनी हालत बताते ।
जगती की दीन दशा अब छूकर,
इस मन को नहीं पिघला पाती है ।
विधवा पड़ोसन भरे ठंडी साँसें,
दुखिया बहू की हो गीली आँखें,
दीनू की नौकरी चली जाए,
मीनू की माँ भीख माँग कर खाए,
ये दुनिया के झमेले चलते रहेंगे ।
कर्मों के फल सबको मिलते रहेंगे ।
श्रवण को मरने का फल तो,
दशरथ को मिलना ही था ।
राम को शाप मिला नारद का,
सीता हरण तो होना ही था ।
जो लिखा टलता नहीं सो,
अब ये बातें हमें रुला कर,
ख़ून नहीं जला पाती हैं ।
अब हम सीमित संतुलित रह कर,
रोते भी हैं कंट्रोल कर-कर ।
व्यर्थ ज़ोर से ना चिल्ला कर,
परंपराओं में आधुनिकता मिला कर,
खुश भी हों तो धीरे से हँस कर,
हर बात को गंभीर मान कर,
"भीतर सार छिपा," सोच कर,
उस छिपे ज्ञान की खोज हमें,
प्रभावित नहीं कर पाती है ।
अब जगत की परिस्थितियाँ हमें,
हँसा पाती नहीं, रुला पाती नही ।
हम २१वीं सदी के सचेत मानव !
अब जगती हमें जंजाल में,
देखो फँसा पाती नहीं है ।
सरस्वती जोशी

Sunday, August 17, 2014

यह मीठे जल की सुंदर नदिया कहलाती है "खारी" !

यह मीठे जल की सुंदर नदिया कहलाती है "खारी" ! 
जगती के निर्णय के आगे बेबस है बेचारी ! 
कारण इसका जान न पाई । 
मीठा जल ही दिया सदा ही । 
कोई कहता : "इसके उद्गम से जुड़ी किसी की अश्रुधार ।" 
कोई कहता : "उफन पड़े तो मचा दे भारी हाहाकार ।" 
पर जो भी हो "खारी" संबोधन कुछ विचित्र सा लगता है । 
मेरा मानस तो इसको "मीठी" कहने को करता है । 
सरस्वती जोशी

Saturday, August 16, 2014

चारों ओर वही तो है,

चारों ओर वही तो है, 
हर उससे मिलने को बेचैन सूरत की मासूमियत में, 
हर उससे रूठे मन की अहमियत में, 
उसकी प्रतीक्षा-रत उदास आँखों की अधीरता में, 
उसकी स्मृति में डूबे सरल मन की सहजता में, 
भक्ति से सराबोर निर्झर के कलकल में, 
मरुथल के अंतर में उठती विकल हलचल में, 
चारों ओर वही आभासित, हर शब्द उसी को समर्पित, 
उस हेतु ही हर भाव अर्पित, उसी के राग से रंजित,
पर यह जो उससे तनिक सी दूरी का अहसास है, 
यह जो उससे मिलने की चिर प्यास है,
एक दिन उससे एकीकार होने की आस है,
इसीसे तो तुम्हें अपने अस्तित्व का आभास है, 
क्या सचमुच तुम्हें जल्दी है इसे खोने की ? 
उसके नूर के असीम प्रकाश में विलीन हो सोने की ?
सरस्वती जोशी

ज़िंदगी ! तेरे होने का अर्थ ढूँढ रहे हैं,

ज़िंदगी ! तेरे होने का अर्थ ढूँढ रहे हैं, 
इस कूड़े के ढेर में ! सुना है : 
"भारत में विवाह में रोड़ी पूजते हैं । 
रोड़ी में रत्न पैदा हो जाते हैं कभी-कभी..." 
रोड़ी कोख की प्रतीक, कहने को महान, 
पूजनीय फिरभी अवहेलना की पात्र ! 
यही है शायद कइयों के जीवन का सत्य ! 
यहीं पैदा हुए एक दिन, न जाने क्यों, 
कभी चाहे, कभी अनचाहे, शायद यहीं,
इस पंच तत्व के ढेर में विलीन होने को ।
शायद यही उनके आदि अंत की सीमा । क्या पता !
जो भी नियति की होगी चाह, 
मिलेगी उन्हें वही राह ! 
पर क्यों सोचें इस पर ? समय कहाँ ?
कितना कुछ ढूँढना बाकी है,
ताकि शाम को पेट में कुछ पड़ सके।
फिलहाल तो जीवन का यही अर्थ है कि :
"रोड़ी में रतन ढूँढें, ढूँढते रहें, 
बिना थके, बिना रुके, बस ! .. "
सरस्वती जोशी

Thursday, August 14, 2014

जा सके क्यूँ कर कहीं ?

Late Dr. V. R. JOSHI Paris ki punya smriti men, 
जा सके क्यूँ कर कहीं ?
जा सके क्यूँ कर कहीं, यूँ अकेला छोड़ हमको ?
क्यों नहीं आई ज़रा, कुछ देर मेरी याद तुमको ?

कितने वादे, कितने सपने, समझे थे हम जिनको अपने, 
देखो कैसे विकल हृदय से, आज पुकारा करते तुमको ।

भग्न स्वप्न की टूटी साँसें, ये बिखरी-बिखरी सी आसें,
मौन व्यथा के स्वर भर-भर कर, पूछ रहे कुछ बातें तुमको ।

कैसे निर्मम हो पाए थे, हम तो थे निर्बल बेचारे ?
छोड़ गए तुम ऐसे कैसे, तोड़ हमारे सभी सहारे ?
पीड़ित मन के हर लम्हे ने, बसा रखा अंतर में तुमको ।

सरस्वती जोशी
चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वह कौनसा देश जहाँ तुम चले ---

Wednesday, August 6, 2014

ये माँ, मानवी, या इस जगती की नारी,

ये माँ, मानवी, या इस जगती की नारी, 
जो कभी ना हिम्मत हारी ।

 जिससे लेता है प्रेरणा संसार । 
जो बिना संतुलन खोये, बिना चिल्लाये,
 बिना रोये, 
जीवन के संघर्षों को कर रही स्वीकार । 
रख आशा का दीपक सर पर, 
भव के दरिया के भीषण वेग से लड़ने को सेनानी सी तत्पर,
 हो कर के बिलकुल निडर, है दृढ़ विश्वास कि होगी पार । 
ले मन में सुधरे भावी की आस
, बिना मन को किये उदास,
 सोच कर : "जब जीना है तो चलना होगा, अविरत आगे बढ़ना होगा ।"
 समझ गई : "है यही जीवन !" इसके साहस, 
इसकी दृढ़ता को करती मैं सादर नमन ।
 सरस्वती जोशी

Tuesday, August 5, 2014

भैया सम्पत जी ! जन्म-दिवस की

तुम इतनी कविताएँ रच दो के चारों ओर तुम्हें ही पाएँ । 
तुम्हारी वाणी के हर स्वर में मात शारदा बस जाएँ । 
हर तन्हा की तन्हाई इन कविताओं से मिट जाए ! 
हर आँख के आँसू सूखें हर प्राणी मुसकाए । 
कवि तुम्हारी वाणी में कुछ ऐसा स्वर भर जाए । 
जो हर निर्बल प्राणी में दिव्य शक्ति जगाए । 
स्वर तुम्हारे पत्थर में भी नई चेतना भर दें । 
भारत का प्रकाश फैला कर जग को जगमग कर दें । 
सरस्वती जोशी
भैया सम्पत जी ! जन्म-दिवस की हार्दिक मंगल कामनाएँ ! आपने मेरी कविताओं को इंटरनेट में लगाने में मेरी जो सहायता की उसके लिये हार्दिक धन्यवाद व जन्म-दिवस का हार्दिक शुभाशीष ! आपको, सौ० भाभीजी को, चि० प्रिय मुन्ने व आपके माताजी-पिताजी को हार्दिक बधाई ! आपकी दीदी सरस्वती

Monday, August 4, 2014

मंज़िल

मंज़िल

मंज़िल मिले न मिले, 
पर उसे पाने का उत्साह, 
दिखलाता है राह, 
देता चलने की चाह, 
उससे थकते नहीं पाँव, 
और सरलता से कटती है राह, 
इसलिये मंजिल का महत्व,
परमात्मा से कम नहीं । 
सरस्वती जोशी

Sunday, August 3, 2014

मित्र का चयन



मित्र का चयन

तन्हाई से हमें कुछ ऐसा है प्यार,
कि हम सरलता से मित्र बनाते नहीं हैं ।
लेकिन जब मान लेते हैं मित्र किसी को,
तो फिर उससे हाथ छुड़ाते नहीं हैं ।


हालाँके जीवन ने सिखाया बार-बार,
कि लोग जीवन भर रिश्ते निभाते नहीं हैं ।
और उनकी बेरुखी का अहसास जब दिल तोड़ता है,
तो घाव आसानी से भर पाते नहीं हैं !

वैसे गर जिंदगी भर के लिये मित्र बनाने का मन हो,
तो मीरा या सूर सा सुंदर चयन हो ।
मित्र ऐसा निलेगा कि मन मोह लेगा,
इह लोक-पर लोक सुधार देगा !
सरस्वती जोशी