Saturday, September 6, 2014

कन्या हूँ मैं शक्ति रूप हूँ

कन्या हूँ मैं शक्ति रूप हूँ
कन्या हूँ मैं शक्ति रूप हूँ पुण्य िदलाने आती हूँ ।
कुछ भी कहे कानून न तुमसे कोई वसीयत पाती हूँ ।

दूध दवा तक को भी तरसूँ फिर भी मैं जी जाती हूँ ।
बचपन से कामों में घर के नित उठ हाथ बँटाती हूँ ।

अपने मन में उठी भावना चुप-चुप रह पी जाती हूँ ।
जिस घर में जब भी तुम ब्याहो शांत भाव से जाती हूँ ।

जैसा भी ससुराल हो मेरा उसको सदा निभाती हूँ ।
जब तक विवश नहीं होजाती घर न तुम्हारे आती हूँ ।

कैसा भी व्यवहार करो मैं बाहर तो गुण गाती हूँ ।
फिर भी हूँ अनचाही ही क्यों समझ नहीं मैं पाती हूँ ।

माना के मैं पूत नर्क से तुम्हें बचा नहीं पाती हूँ ।
पर क्या मैं अपनी हत्या से नर्क नहीं दिलवाती हूँ ?

क्यों निर्ममता से मैं ऐसे गर्भ में मारी जाती हूँ ?
अपनी माँ का मुख देखे बिन भूमिगत हो जाती हूँ !

क्यों मेरी नियति बनी ऐसी ? मैं सोच-सोच रह जाती हूँ ।
किससे पूछूँ, कौन बताए ? समझ नहीं मैं पाती हूँ ।

सरस्वती जोशी

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