"ज़िंदगी को खुलकर जीने के अर्थ,"
क्या किसी ने कभी बताये हैं ?
यह वाक्य जो हम दोहराते हैं बार-बार,
क्या सच में इसका अर्थ समझ पाये हैं ?
या किसी ने कभी समझाये हैं ?
इसका पूरी तरह अहसास भी कर पाये हैं ?
और फिर क्या यह सच में हमारे हाथ है ?
हम पर निर्भर करता है ?
फिर भी हम इसे दोहराते हैं ।
स्वयं को बहकाने के लिये ?
रोतों को हँसाने के लिये ?
जिंदगी का बोझ घटाने के लिये ?
खुद को भ्रम में डुबाने के लिये ?
पता नहीं !
पर इस वाक्य में अनोखी शक्ति है,
सो कहने में कोई खता नहीं !
सरस्वती जोशी
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