Tuesday, September 9, 2014

"ज़िंदगी को खुलकर जीने के अर्थ,"

"ज़िंदगी को खुलकर जीने के अर्थ,"
क्या किसी ने कभी बताये हैं ? 
यह वाक्य जो हम दोहराते हैं बार-बार, 
क्या सच में इसका अर्थ समझ पाये हैं ? 
या किसी ने कभी समझाये हैं ? 
इसका पूरी तरह अहसास भी कर पाये हैं ? 
और फिर क्या यह सच में हमारे हाथ है ? 
हम पर निर्भर करता है ? 
फिर भी हम इसे दोहराते हैं । 
स्वयं को बहकाने के लिये ? 
रोतों को हँसाने के लिये ? 
जिंदगी का बोझ घटाने के लिये ? 
खुद को भ्रम में डुबाने के लिये ? 
पता नहीं ! 
पर इस वाक्य में अनोखी शक्ति है,
सो कहने में कोई खता नहीं ! 
सरस्वती जोशी

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