समर्पण
कितनी बार सोचती हूँ,
गर्व से कह सकूँ :
"अर्पित है तव चरणों पर,
मेरा यह जीवन नि:सार ।"
पर याद आ जाता है :
"चीप, मुसे फूलों को ले जाने से,
खाली हाथ डिनर पर जाना ज़्यादा अच्छा !"
कहा तुमने था कितनी बार ।
"अर्पित यह टूटी टहनी,
उपहार रूप में यह दूँगी," कहते,
फड़फड़ा कर रह जाते मेरे ओठ ।
वाणी देती नहीं साथ ।
फिर भी न जाने क्यों,
कितनी बार किया अर्पित,
मन ही मन में, मैंने तुम को,
अपना यह जीवन,
हो चाहे यह व्यर्थ प्रलाप !
और हर बार लगा करता है :
"क्या नहीं इसमें कुछ सार ?
कि है अभी भी मेरे पास,
कहीं कुछ अपना,
जिसे तुम्हें दे सकने का,
कर पाती हूँ अब भी अहसास ।
औ अर्पित करती हूँ हर साँस !
हो चाहे यह बिल्कुल नि:सार !
पर इसमें कहीं घुला पाओगे,
मेरी वीणा के स्वर का गुंजार ।
मेरे अंतर मन की पुकार ।
मेरा समस्त ही संसार !
सरस्वती जोशी
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