Tuesday, September 9, 2014

समर्पण कितनी बार सोचती हूँ,

समर्पण 
कितनी बार सोचती हूँ, 
गर्व से कह सकूँ :
"अर्पित है तव चरणों पर, 
मेरा यह जीवन नि:सार ।"
पर याद आ जाता है :
"चीप, मुसे फूलों को ले जाने से, 
खाली हाथ डिनर पर जाना ज़्यादा अच्छा !"
कहा तुमने था कितनी बार ।

"अर्पित यह टूटी टहनी,
उपहार रूप में यह दूँगी," कहते, 
फड़फड़ा कर रह जाते मेरे ओठ ।
वाणी देती नहीं साथ । 
फिर भी न जाने क्यों,
कितनी बार किया अर्पित, 
मन ही मन में, मैंने तुम को, 
अपना यह जीवन,
हो चाहे यह व्यर्थ प्रलाप !

और हर बार लगा करता है : 
"क्या नहीं इसमें कुछ सार ?
कि है अभी भी मेरे पास, 
कहीं कुछ अपना,
जिसे तुम्हें दे सकने का, 
कर पाती हूँ अब भी अहसास ।
औ अर्पित करती हूँ हर साँस !

हो चाहे यह बिल्कुल नि:सार !
पर इसमें कहीं घुला पाओगे, 
मेरी वीणा के स्वर का गुंजार ।
मेरे अंतर मन की पुकार ।
मेरा समस्त ही संसार !

सरस्वती जोशी

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