Friday, September 26, 2014

हम उत्साह दिला-दिला देखते गये ।

* हम उत्साह दिला-दिला देखते गये । 
वह हँस-हँस के आगे लिखते गये । 
भूखे पेट, पानी पी-पी कर भी,
हमको साहित्य रच हँसाते गये । 
वाह-वाह के नशे में डूब,
अपने होश गँवाते गये ।
बीबी की बुड़बुड़ हुई,
बच्चे ने गुहार लगाई ।
पर यह आवाज़ें उसको,
इक पल भी रोक न पाईं ।
कर अनसुना, गैरों के दुखों को अपना बना,
कर-कर के वर्णन बताते रहे ।
कभी आलनी की भाजी औ मक्की की रोटी,
कभी राब पी कर घर चलाते रहे ।
जनता को इससे मतलब नहीं था,
वह कविता से सब को हँसाते रहे ।
सब सुन-सुन के ताली बजाते रहे ।
उन्हें तान पर सब चढ़ाते रहे ।
घरवाले आँसू बहाते रहे ।
निकम्मा मान ताने सुनाते रहे ।
कविताओं पे कविताएँ आती रहीं ।
पर एक दिन अचानक कुछ होश आया !
बेटे का फटा कुर्ता नज़र आया,
तो शरमा गये ख़ुद पर ही रोष आया ।
पैबंदों से भरी थी पत्नी की साड़ी !
नही ! नहीं चल सकती यूँ मेरे घर की गाड़ी ।
राब में कुछ और पानी बढ़ गया,
तो वाह-वाह का सारा नशा झड़ गया ।
अपनों पे लिखने को कलम थी उठाई ।
पर कागज़ पे पड़े आँसू से फैल गई स्याही ।
तोड़ कर कलम घर से गये निकल ।
उर में थी हलचल, मन था विकल ।
नहीं ! अब नहीं, मैं सब छोड़ दूँगा ।
कहीं नौकरी या कुछ भी करूँगा ।
बीबी औ बच्चों का पेट तो भरूँगा ।
अध्यात्म औ साहित्य से काम ना चलेगा ।
इससे न मेरा परिवार पलेगा ।
माँ शारदा की छबि मन में आई ।
बिल्कुल वही जिस पर थी कविता बनाई ।
इक पल को फिर से मन उनका डोला ।
पर बच्चे के आँसू से जब दुख को तोला ।
तो सब भूल कर बस निकले वे बाहर ।
तब से खोजते हैं कुछ जा इधर से उधर ।
उम्मीद है उन्हें कुछ तो मिल जायेगा ।
कोई साहित्य प्रेमी तो काम आयेगा ।
घर में ठीक से चूल्हा जल पायेगा ।
कवि फिर कोई कविता रच सुनाएगा ।
कुछ नहीं तो अपनी कहनी ही गाएगा ।
पर इस बार शायद हँसी की जगह वह,
आँसू का वितरण कर-कर के जाएगा !
सरस्वती जोशी

Monday, September 22, 2014

२१वीं सदी की नारी

२१वीं सदी की नारी
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता तथा,
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना
कई बार कितना भ्रम में, समझ कर भी न समझने का भाव दिखाते हुए जीवन बिताने को विवश हो जाता है प्राणी ! प्रेमचंद की "प्रेम की होली" नामक कहानी याद आने लगती है । नवरात्रि में जिन नारियों व कन्याओं के आगे शीश झुकेंगे क्या वह छबि इस उपरोक्त संघर्षों से जूझ, बंधनों को तोड़ आगे बढ़नेवाली नारी की होगी ? यही नहीं, क्या इस नारी को किसी उत्सव, व्रत या उद्यापन में "गोरणी", "सवासणी" बनाया/माना जायगा ? क्या उसे शक्ति की प्रतीक कन्याओं, महिलाओं की पंक्ति में स्थान मिलेगा, किसी शुभ संस्कार, पूजन आदि के बाद होने वाले प्रथम प्रणाम को प्राप्त करने का सम्मान व अधिकार मिलेगा ? उसने जो-जो खो दिया उसकी सूची बनाने बैठें तो ग्रंथ बन जाएँ ! यह बड़े साहस की बात है कि उसने कष्टों के कारागार से निकल बंधनों को तोड़ने की हिम्मत की, पर क्या अब अग्नि-परीक्षा पूर्णतया समाप्त हो गई ? क्या भविष्य की सब समस्याएँ हल हो गईं ? क्या उसकी शिक्षा, पद, योग्यता, सम्पन्नता, भगवद्भक्ति, सब मिल कर भी उसे आम कन्या या सुहागिन से भिन्नवाली श्रेणी की होने के अहसास वाले जीवन से बचा पाएँगे ? उसे इतना सशक्त बना पायेंगे कि वह रास्ते में पग-पग पर आने वाले काँटों की चुभन को महसूस न करे, उन्हें रौंदने के अहसास के साथ मुस्कुराती आगे बढ़ जाए? कितने प्रश्न मुँह बाये खड़े होजाते हैं सामने मन को विचलित करने के लिये ! पर कहाँ ढूँढें उत्तर, किससे पूछें, काश इन नारियों को उनका सही diserved स्थान पुन: प्राप्त होने का कोई मंत्र या साधन मिल सके इन्हें ।
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता
१) हाँ उतार दी मैंने वे चूड़ियाँ जो मुझे कमज़ोर बनातीं थीं
हाँ उतार दी मैंने वो पायल जो मेरे
कदमों को रोकती थी
हाँ उतार दिए मैंने गले के वे हार जो मेरी आवाज़ दबाते थे
कर दिया अलग उन रिश्तों को जो मेरे शोषण के लिए जीते थे
फेंक दिए वे विशेषण जिनसे लाद दिया गया मुझे
छोड़ दिया उस साथ को जिसने कुचला मुझे कमज़ोर मानकर
तोड़ दिए वो बंधन जिनको धोखा खाकर भी मैं पूजती थी
आज मैं आजाद हूँ
क्यों कि नहीं है अब मेरी पहचान दूसरों की गढ़ी हुई
आज मैं अबला नारी नहीं
नारी शक्ति से पहचानी जाती हूँ
मुझे पहचानों मैं गहनों से नहीं आत्मबल से शृंगार रचती हूँ
मैं 21वीं सदी की नई उभरती हुई नारी
एक सशक्त नारी हूँ...
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना (बेटी ! जैसे तुमने कविता में दाम्पत्यजीवन में विफल होजाने वाली आत्मनिर्भर सशक्त नारी का वर्णन किया मैंने उससे कुछ प्रश्न पूछे हैं बस ! ताकि I don'n mind / care / bilive / follow / ... के पीछे छिपे दर्द या आनंद की अनुभूति के अहसास के ज्ञान से और नारियाँ भी लाभ उठा सकें ।)
२) हे २१वीं सदी की नारी !
हे २१वीं सदी की नारी !
उम्मीद करें के तुम सच में,
सदा सशक्त कहलाओगी ।
नव अनुभव, नव परीक्षण में,
आगे रोड़े नहीं पाओगी ।
हार, चूड़ियाँ, पायल की,
कमी न तुम्हें सताएगी ?
जो मंगल सूत्र त्यागे तुमने,
उनकी याद कभी ना आयेगी ?
अबसे आगे सदा सुहाना,
सौरभमय मग आएगा ?
कोई काँटा बेध चरण को,
रोड़ा नहीं अटकाएगा ?
गर सच में सरल, सुगम मग पाओ,
सुखमय यह संसार मिले ।
सदा तुम्हारी बगिया में अब,
सुंदर सौरभमय पुष्प खिलें ।
तो हे साहसी शक्तिमयी !
तुम हम सबको भी बतलाना ।
पर देखो ! कहीं यथार्थ छिपा कर,
मिथ्या भ्रम में ना उलझाना ।
अपने अनुभव से जो हमको,
तुम अवगत करवाओगी ।
हे २१ वीं सदी की नारी !
तुम पूर्ण बुद्ध कहलाओगी ।
हमें प्रतीक्षा है सच में,
तुम्हारे सब उपदेशों की ।
जो स्वयंभुक्त अनुभव के होंगे,
उन सारे संदेशों की ।
सरस्वती जोशी

Tuesday, September 16, 2014

समाज क्या कहेगा !

समाज क्या कहेगा !
प्रभु ने ख़ुश हो मानव बनाया !
कितने गुणों से उसे सजाया !
पर मानव ने समाज बना़या ।
मन मंदिर में उसे बिठाया ।
और भला वह क्यों ना करता ?
भगवान भरोसे कब तक रहता ?
वह प्रभु जो मूरत में छिपता ।
लाख प्रयत्न करें ना दिखता ।
पर समाज से सब कुछ मिलता ।
उस में ही वह बेटी ब्याहता ।
बहू भी समाज से लाता ।
उससे अपना वंश बढ़ाता ।
मान-सम्मान वही़ीं है पाता ।
वही तो उँचे पद दिलवाता ।
कैसे भी लक्ष्मी को लाओ ।
कोई भी साधन अपनाओ ।
बस तुम लक्ष्मी-पति बन जाओ ।
मन खोल उसकी रस्में निभाओ ।
जो उनका पालन ना कर पाओ ।
तो चुप-चुप आसन से उठ जाओ ।
अपनी सीमा लो पहचान !
सीमा सम होगा सम्मान !
कैसे भला मान गँवाएँ ?
कैसे नीचे बैठ जाएँ ?
लोग इसे तो समझ न पाते ।
"समाज क्या कहेगा ?" यूँ दोहराते ।
जैसे समाज से डरना भूल !
देख इसे चुभता है शूल ।
कहते : "देखो ! प्रभु से डरना !
जो वह चाहे सो ही करना !"
"अरे प्रभु कौन भाग जायगा ?
जब बुलाओ आ ही जायगा ।
अंतिम साँस में भी पुकारो ।
एक दो आवाज़ें मारो ।
भोला- भाला दौड़ आयगा।
नाव पार करके ही जायगा ।
पर समज की बात है न्यारी ।
उससे निभानी रिश्तेदारी ।"
सो मित्रो ! यह भय सदा रहेगा ।
"ध्यान रखना ! समाज क्या कहेगा !"
सरस्वती जोशी

हंजा के जीवन की एक झलक !

देवी संध्या / संझा / हंजा
अविवाहिताओं द्वारा मनवाँछित पति, उदार सास, अच्छी ससुराल, मैके तथा भाई के सुख की प्राप्ति हेतु श्राद्ध पक्ष में १६ दिन तक पूजित देवी संध्या / संझा / हंजा के जीवन की एक झलक !
संध्या केवल देवी नहीं हर कन्या की सहेली व बहन है, तथा हर घर की बहन-बेटी / कन्या का प्रतिनिधित्व भी करती है । इसके थापे तथा किला कोट डा० साधना जोशी-सुखवाल ने कनाडा में छपी एक पत्रिका में छापे थे, तथा श्री सुरेशजी व्यास सिखवाल ने उन्हें SNT में भी लगाया था !
संध्या / संझा / हंजा का जीवन
सावन में भी पतझड़ सी सूनी शाम ।
ससुराल का छोटा सा गाँव ।
जा खेतों के पास नंगे ही पाँव ।
पथिक-हीन, वाहन विहीन,
क्षितिज तक फैली लंबी राह ।
किसी खेत की अध-सूखी सी,
लंबी-सी खजूर के तले, सहमी सी,
तने से लिपटी खड़ी,
परम सुंदरी, भोली संध्या,
अनमनी, उदास, देखती बाट ।
होती निराश बार बार ।
फिर भी बुनती आशा के तार ।
जा नित्य पथ लेती निहार ।
"मैके को जाती पगडंडियों पर खड़ी,
दूर-दूर तक देखती रहूँ ?
हाँ ! क्यों नहीं !
क्या पता आ जाय सुध,
मेरी बिछुड़ी भौजाई को ।
माँ की आँख फरक जाए,
वह भेजे लेने भाई को ।
किसी सहेली को तीजों के,
झूलों में ही आएँ याद ।
वे गीत जो मैं गाया करती थी,
जिनमें करती थी फरियाद :
"माँ ! मुझको नहीं भुला देना !
भैया को भेज बुला लेना..."
आ गई संध्या की बेला !
पंछी लौट के घर को आए ।
अब न यहाँ कोई आएगा,
क्यों बैठी हूँ आस लगाए ?
कुछ पल और देख लूँ बाट ?
या पति के घर लौट जाऊँ ?
फिर से अपना वही नित्य का,
गृहणी का धर्म निभाऊँ ?"
लगा अगले दिन की आस,
लौट आती पति के द्वार ।
खाती थी नित्य सास की मार ।
सिर की फटी चूँदड़ तार-तार ।
पति भी तो नहीं मिला उदार ।
सोचती वह बार-बार :
"भाई न मुझे भुला पायेगा ।
इक दिन वह यहाँ आएगा ।
सिर पर धरेगा स्नेह का हाथ ।
बैठेगा कुछ देर साथ ।
मेरे कष्ट देख द्रवित हो कर,
आँसू की कर देगा बरसात ।
करुणा के दो बोल बोल कर,
मेरी पीड़ा करेगा शांत ।
कोई तो है दुख का साथी,
यह विश्वास जगा जाएगा ।
घर तो मुझे लौटना होगा,
पर दुखियारापन घट जाएगा ।
कटु शब्दो की बौछारें तो,
मिलना बंद नहीं होगा ।
जो नियति मिली है मुझे देव से,
उसको तो सहना ही होगा ।
यूँ नियति की कृपा की आस में,
मैके के प्रति जमे विश्वास में,
शामें आती रहीं, जाती रहीं ।
संध्या अटल बनी सी अपनी,
परंपराओं को निभाती रही ।
पर उसके जीवन की पीर,
सह न सका कोमल शरीर ।
और भव की उस पीड़ा से,
मुक्त हो गया उसका तन ।
विदा हो गई इस जगती से,
तोड़ रिश्तों के सब बंधन ।
मैके में समाचार आया ।
तो सब का मन भर आया ।
कैसे मन मजबूत बना कर,
नारी का कर्तव्य सिखाया !
कैसे बन कठोर समझाया :
"पतिगृह ही स्वर्ग तुम्हारा संध्या !
तुम परधन थीं, यह भूल न जाना !
खड़ी गई थीं तुम उस घर में,
बस आड़ी ही बाहर आना... "
और नारी-हृदय इस
अन्याय को ना सह पाया ।
हर सहेली ने संध्या की,
भूल उसकी "बलाई" जात को,
विस्मित कर जात-पाँत को,
मान कर देवी उसे,
हर घर के बाहर कर चित्रित,
संध्या / संझा / हंजा का थापा बनाया ।
श्रद्धा से कर के पूजन,
बार-बार कर के वंदन ।
गा-गा कर उसका करुण जीवन,
श्रद्धांजलि दे किया नमन ।
एक नहीं पूरे सोलह दिन ।
सरस्वती जोशी

हे जग रचियता ! एक बार बनो "नारी"

हे जग रचियता ! एक बार बनो "नारी"
हे जग रचियता ! 
एक बार बनो "नारी",
आ जग में ले लो अवतार । 
जब तक ऐसा नहीं करोगे,
तुम्हारा पर-पीड़ा का अनुभव बेकार ।

माँ की कोख में आते ही,
अनचाही मैं कहलाती हूँ । 
कुछ सिक्कों के बदले में मैं,
खुले आम मारी जाती हूँ ।

गर किसी पुण्य से नौ महीने तक,
जीवित रह जग में आती हूँ । 
तो जिस घर में हो जन्म लिया,
वहीं "परधन" कहलाती हूँ ।

मैं पुत्र नहीं, अनपेक्षित हूँ,
पग-पग पर करती यह अहसास । 
बचपन से ही ट्रेनिंग मिलती : 
"जाने कैसी होगी सास ।

जाने कैसा पति मिलेगा, " 
सो सीख मुझे उसकी मिलती ।
एक बार तुम भी यह सीखो,
हे जगकर्ता ! है यह विनती ।

यह घर तो है मैका केवल ।
पग-पग पर अहसास करोगे ।
गर इक पल को भी चूक गये तो,
लंबा सा उपदेश सुनोगे ।

पितृगृह होता पराया,
यहाँ नहीं कुछ मेरा अपना । 
जन्म लेने को इक जगह चाहिये,
पर जीवन भर नहीं है रहना ।

पतिगृह पर तब तक अधिकार,
जब तक मैं पति को स्वीकार ।
उसके मन को जीत सकूँ ना,
तो मेरा जीवन निस्सार ।

गर उसका मन जीत न पाऊँ,
वह किस्मत से देवे छोड़ ।
तो मैं सबसे अभागिन प्राणी,
सब लेते मुझसे मुँह मोड़ ।

शास्त्र भी तुम्हारे यही सिखाते,
मान अभागिन हैं ठुकराते ।
माँ बनना भी वे मेरे,
जीवन का प्रमुख लक्ष्य बताते ।

मेरी शिक्षा-दीक्षा-योग्यता,
कोई महत्व नहीं रखती ।
उसे सोच महत्व मेरा,
नहीं तोलती है यह जगती ।

चाहे बन विदुषी महिला मैं,
बन जाऊँ मंत्री या अफसर ।
हों चाहे मुझमें गुण सारे,
नही रखूँ कोई भी कसर ।

पर मेरी शुभता-अशुभता के,
माप-दंड पुरुषों पर निर्भर ।
मिले मान्यता मुझको या ना,
यह है पति-पुत्र-भाई पर निर्भर ।

बस उनका अस्तित्व ही मानो,
है मेरे जीवन का सार ।
उनसे विहीन जो हो जाउँ तो,
कहलाती भाग्य-हीन हर बार ।

कितना कठिन होता है प्रभुवर !
इस पीड़ा के साथ में जीना ।
अवहेलना का विष जब हर पल,
पग-पग पर पड़ता है पीना ।

दीनबंधु कहलाते हो तो हरि !
कुछ दिन तो ख़ुद भी दीन बनो ।
उनके जीवन की सच्चाई का,
आ तुम भी अनुभव स्वयं करो ।

एक बार तुम भी तो आ कर,
इस व्यथा में काटो दिन चार ।
इसके बिना तुम्हें करुणामय !
दीन-वत्सल कहने में क्या सार ?

सरस्वती जोशी
अबला जीवन ! हाय ! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध आँख में पानी । (जय शंकर प्रसाद) । वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी, दीप शिखा सी शांत, दलित, भारत की विधवा है । ( सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला") । कस विधि सृजी नारि जग माँही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं । (गोस्वामी तुलसीदास) । अगले जनम मोहें बिटिया न कीजो... (फिल्म का गाना, शायद उमराव जान का ), मैं तो बाबुल तेरे खूँटे की गैया बाँधे वहीं बँध जाँय, तेरे जल की मछरिया तड़प-तड़प रह जायँ, तेरे बागों की चिड़िया़ ढेला मारे उड़ जायँ... (लोक गीत)।

Friday, September 12, 2014

पिता को प्रणाम करती हूँ जो इतना महान है !

पिता
हम सदा या अधिकतर माँ का गुणगान करते नहीं थकते ! 
यह सच है कि नाता गर्भ में धारण करने, जन्म देने, पालने की, 
हमारे स्वास्थ्य-भोजन-वस्त्र, हमारे सुख-दुख बाँटने आदि की भूमिका माँ निभाती है । 
पर ध्यान से सोचें तो माँ की भूमिका जहाँ से समाप्त होती है, 
पिता की वहाँ से प्रारंभ होती है और फिर कभी समाप्त नहीं होती, 
हमारी शिक्षा-दीक्षा, हमें परिवार में, समाज में, संसार में समुचित 
स्थान दिलाने, हमें उन्नत बनाने, हमारे जीवन को सफल-सम्माननीय 
बनाने, हमारी महत्वाकांक्षाओं को जगाने, हमें सशक्त बनाने, 
उत्साह देने व हमारा हर दुख या जीवन की बाधा मिटाने में पिता
 अपनी जान लड़ा देता है, और यह सब बिना गिनाये, अपनी
 इज्जत को हमारी इज्जत से जोड़, हमारी उन्नति को अपनी 
उन्नति मान कर, बिना अहसान जताए, मूक तपस्वी की तरह
 करता चला जाता है ! मैं केवल मेरे ही नहीं हर उस
 पिता को प्रणाम करती हूँ जो इतना महान है !
सरस्वती जोशी

Thursday, September 11, 2014

कौन हो तुम जो

कौन हो तुम जो चमकते आ अचानक अँधियारे में ? 
हर बार जब लगता मुझे मैं फँस गई इक गलियारे नें । 
हाथ पकड़ बाहर ले जाते पोंछ कर हर अश्रु मेरा । 
पर सहसा कहीं विलीन हो जाते मुझको फिरसे छोड़ अकेला । 
तुम चाहे पकड़ो हाथ मेरा पर मैं तुमको पकड़ नहीं पाती । 
बेबस खड़ी सोचती रहती, भर आती है मेरी छाती ।
कृतज्ञता के भार में डूबी यूँही देखती रह जाती ।
पर वापस सुध आती है तो निज को जग / भव में डूबा पाती ।
सरस्वती जोशी

१) ओ अतीत ! मेरे अतीत !

१) ओ अतीत !
मेरे अतीत !
हालाँके तू अब गया बीत ।
अब तो मेरा भूत कहाता ।
पर तुझसे है मेरा, 
एक विचित्र खट्टा-मीठा अटूट सा नाता ।
"पीछे मत देखो ! देखो आगे !"
यह है सब लोगों का कहना ।
किंतु मुझे तो लगता है के,
तू है अब भी मेरा अपना ।
कैसे निर्मोही बन पीछे छोड़,
आगे चल दूँ नाता तोड़ ?
जब तक मेरी साँस रहेगी ।
तेरी स्मृतियाँ पास रहेंगी ।
तूने ही तो बन प्रेरणा,
मुझको अब तक मार्ग दिखाया ।
बस आगे भी ऐसे ही,
देना साथ बन कर साया !
सरस्वती जोशी
२) क्यों आते वे िदन िफर याद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
कहते सब: "बीती बातों को भूलो, मत वह बात करो ! "
जो कुछ पाया है मधुमय, बस उसको तोलो माप करो..."
िफर इस मधुमय रस के भीतर, लगता क्यों कुछ कड़वा स्वाद !
सुनते हैं : "है प्यार भरा, यह रसमय सारा ही संसार ।
जीवन है हँस-हँस जीने को, करते जाअो सब को प्यार ।"
हँसते-हँसते ही आ जाता क्यों िफर नयनों में यह खार ?
सुनते जब उपदेश िकसीके, सीने में क्यों उठता ज्वार ?
क्यों इस मन का कोई कोना, व्याकुल हो करता चीत्कार ?
क्यों मन करता कोई सुन ले, कभी बैठ कर मन की बात ?
क्यों दे कोई भला िकसीको, अपनी मुस्कानों के कुछ क्षण ?
िफर भी जाने-अनजाने में, यही चाहता है पागल मन ।
कहीं िमले कोई अपना जो, दे दे कुछ क्षण की सौगात !
िकतना चाहें अब न करें हम, कभी कहीं दुखड़े की बात ।
झोली भर मुस्कानों की हम, खुिशयों की कर दें बरसात ।
पर िनर्धन के बस में है क्या, दे दे मुस्कानों का मोल ?
कैसे चुकाए, कैसे पाए, कौन सुने उसकी फरियाद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
सरस्वती जोशी

हर एक उलझन ।

माना के मानव जीवन तो है ही उलझनों का जंजाल । 
हर व्यक्ति के चारों ओर बना हुआ है माया जाल । 

जिधर भी देखो उधर दिखता सदा ही एक घेरा । 
जो रच देता है इर्दगिर्द एक घना सा अँधेरा । 

पर गर मानव धार ले तो शक्ति उसकी है अपार । 
फिर यह संभव नहीं के बाँध पाये अंधकार । 

जब प्रकाश की ज्योति ले वह बढ़ा देता है चरण । 
तो स्वत: सुलझ जाती पंथ की हर एक उलझन । 

और वह बढ़ता जाता पूर्ण रूप से शांत मन । 
पहुँच जाता लक्ष्य तक कर पार सारे सघन वन । 

सरस्वती जोशी

Tuesday, September 9, 2014

मेरे पिता स्वर्गीय श्री माँगीलालजी सुखवाल को सादर समर्पित

मेरे पिता स्वर्गीय श्री माँगीलालजी सुखवाल को सादर समर्पित
हो सकता है आज समय वह जिसका कभी न देखा सपना । 
पर अतीत के गर्भ में छिपा हुआ जो जीवन अपना ।

जिसकी बदौलत मिलते रहे साहस, शक्ति औ प्रेरणा । 
आज है परिणाम जिसका, जिससे जागी थी चेतना ।

हैं अत्यंत मूल्यवान वे कष्टभरी बीती घड़ियाँ । 
शुरू हुआ जप जिन मनकों से उस माला की पावन लड़ियाँ ।

उन्हीं में कहीं वह दिव्य शक्ति है जिसने भावी मार्ग दिखाया । 
वर्तमान का जीवन जिससे बन ज्योतिर्मय जगमगाया ।

सरस्वती जोशी

समर्पण कितनी बार सोचती हूँ,

समर्पण 
कितनी बार सोचती हूँ, 
गर्व से कह सकूँ :
"अर्पित है तव चरणों पर, 
मेरा यह जीवन नि:सार ।"
पर याद आ जाता है :
"चीप, मुसे फूलों को ले जाने से, 
खाली हाथ डिनर पर जाना ज़्यादा अच्छा !"
कहा तुमने था कितनी बार ।

"अर्पित यह टूटी टहनी,
उपहार रूप में यह दूँगी," कहते, 
फड़फड़ा कर रह जाते मेरे ओठ ।
वाणी देती नहीं साथ । 
फिर भी न जाने क्यों,
कितनी बार किया अर्पित, 
मन ही मन में, मैंने तुम को, 
अपना यह जीवन,
हो चाहे यह व्यर्थ प्रलाप !

और हर बार लगा करता है : 
"क्या नहीं इसमें कुछ सार ?
कि है अभी भी मेरे पास, 
कहीं कुछ अपना,
जिसे तुम्हें दे सकने का, 
कर पाती हूँ अब भी अहसास ।
औ अर्पित करती हूँ हर साँस !

हो चाहे यह बिल्कुल नि:सार !
पर इसमें कहीं घुला पाओगे, 
मेरी वीणा के स्वर का गुंजार ।
मेरे अंतर मन की पुकार ।
मेरा समस्त ही संसार !

सरस्वती जोशी

"ज़िंदगी को खुलकर जीने के अर्थ,"

"ज़िंदगी को खुलकर जीने के अर्थ,"
क्या किसी ने कभी बताये हैं ? 
यह वाक्य जो हम दोहराते हैं बार-बार, 
क्या सच में इसका अर्थ समझ पाये हैं ? 
या किसी ने कभी समझाये हैं ? 
इसका पूरी तरह अहसास भी कर पाये हैं ? 
और फिर क्या यह सच में हमारे हाथ है ? 
हम पर निर्भर करता है ? 
फिर भी हम इसे दोहराते हैं । 
स्वयं को बहकाने के लिये ? 
रोतों को हँसाने के लिये ? 
जिंदगी का बोझ घटाने के लिये ? 
खुद को भ्रम में डुबाने के लिये ? 
पता नहीं ! 
पर इस वाक्य में अनोखी शक्ति है,
सो कहने में कोई खता नहीं ! 
सरस्वती जोशी

Saturday, September 6, 2014

कन्या हूँ मैं शक्ति रूप हूँ

कन्या हूँ मैं शक्ति रूप हूँ
कन्या हूँ मैं शक्ति रूप हूँ पुण्य िदलाने आती हूँ ।
कुछ भी कहे कानून न तुमसे कोई वसीयत पाती हूँ ।

दूध दवा तक को भी तरसूँ फिर भी मैं जी जाती हूँ ।
बचपन से कामों में घर के नित उठ हाथ बँटाती हूँ ।

अपने मन में उठी भावना चुप-चुप रह पी जाती हूँ ।
जिस घर में जब भी तुम ब्याहो शांत भाव से जाती हूँ ।

जैसा भी ससुराल हो मेरा उसको सदा निभाती हूँ ।
जब तक विवश नहीं होजाती घर न तुम्हारे आती हूँ ।

कैसा भी व्यवहार करो मैं बाहर तो गुण गाती हूँ ।
फिर भी हूँ अनचाही ही क्यों समझ नहीं मैं पाती हूँ ।

माना के मैं पूत नर्क से तुम्हें बचा नहीं पाती हूँ ।
पर क्या मैं अपनी हत्या से नर्क नहीं दिलवाती हूँ ?

क्यों निर्ममता से मैं ऐसे गर्भ में मारी जाती हूँ ?
अपनी माँ का मुख देखे बिन भूमिगत हो जाती हूँ !

क्यों मेरी नियति बनी ऐसी ? मैं सोच-सोच रह जाती हूँ ।
किससे पूछूँ, कौन बताए ? समझ नहीं मैं पाती हूँ ।

सरस्वती जोशी

Friday, September 5, 2014

कन्या "परधन"

कन्या "परधन"
कैसे कहूँ, क्या कहूँ ओ बेटी !
कैसे अपनी व्यथा बताऊँ ?
मन के भाव तुझे समझाऊँ !
जगती की रीत ही न्यारी है ।
यह सोच नहीं पाती है के,
तू तो अब भी मुझको प्यारी है ।

कन्या "परधन" कहलाती है, 
ससुराल एक दिन जाती है । 
बस उस दिन से वह बन "परधन", 
बिना बुलाए ना आती है ।

अपने पति के घर के रंग में,
चुपचाप सदा को रंग जाती है । 
मैका याद कभी आए तो,
हो मौन स्वयं को समझाती है ।

विस्मित सा करदेती है के,
कहीं जनम लिया था उसने । 
पर उस घर की स्मृतियों को संजो,
सदा रखती है मन में ।

दक्ष पुत्री ने तोड़ा बंधन,
बिना बुलाई आई थी । 
बदले में जो पाया सुन कर,
अग्निकुंड में समाई थी ।

सीता ने समझदार बन कर,
इक आश्रम को अपनाया था । 
पर पिताश्रिता बन जा मैके में,
जीवन नहीं बिताया था ।

शकुंतला परित्यक्ता हो कर,
रिषि आश्रम में आई थी । 
पर निराश हो भटक वनों में,
अपनी उमर बिताई थी ।

इसीलिये कहती हूँ बेटी! 
मिथ्या भ्रम में मत रहना । 
पति का घर ही स्वर्ग तुम्हारा, 
याद इसे हरदम रखना ।

यह न सोचना ये बातें मैं,
लिखती हूँ खुश हो-हो कर । 
हाथ काँपते हैं मेरे, 
आँसू बहते हैं झर-झर ।

लेकिन जग के नियम बदलना,
इस निर्बल के हाथ नहीं है । 
जग शक्ति कहे या माता मुझको,
पर इसमें वह मेरे साथ नहीं है ।

पर चाहे रहो कहीं पर भी तुम, 
मन माँ का सदा साथ होगा । 
मेरी साँस-साँस से हरदम,
आशीर्वाद तुम्हें देगा ।

सरस्वती जोशी