* हम उत्साह दिला-दिला देखते गये ।
वह हँस-हँस के आगे लिखते गये ।
भूखे पेट, पानी पी-पी कर भी,
हमको साहित्य रच हँसाते गये ।
वाह-वाह के नशे में डूब,
अपने होश गँवाते गये ।
बीबी की बुड़बुड़ हुई,
बच्चे ने गुहार लगाई ।
पर यह आवाज़ें उसको,
इक पल भी रोक न पाईं ।
कर अनसुना, गैरों के दुखों को अपना बना,
कर-कर के वर्णन बताते रहे ।
कभी आलनी की भाजी औ मक्की की रोटी,
कभी राब पी कर घर चलाते रहे ।
जनता को इससे मतलब नहीं था,
वह कविता से सब को हँसाते रहे ।
सब सुन-सुन के ताली बजाते रहे ।
उन्हें तान पर सब चढ़ाते रहे ।
घरवाले आँसू बहाते रहे ।
निकम्मा मान ताने सुनाते रहे ।
कविताओं पे कविताएँ आती रहीं ।
पर एक दिन अचानक कुछ होश आया !
बेटे का फटा कुर्ता नज़र आया,
तो शरमा गये ख़ुद पर ही रोष आया ।
पैबंदों से भरी थी पत्नी की साड़ी !
नही ! नहीं चल सकती यूँ मेरे घर की गाड़ी ।
राब में कुछ और पानी बढ़ गया,
तो वाह-वाह का सारा नशा झड़ गया ।
अपनों पे लिखने को कलम थी उठाई ।
पर कागज़ पे पड़े आँसू से फैल गई स्याही ।
तोड़ कर कलम घर से गये निकल ।
उर में थी हलचल, मन था विकल ।
नहीं ! अब नहीं, मैं सब छोड़ दूँगा ।
कहीं नौकरी या कुछ भी करूँगा ।
बीबी औ बच्चों का पेट तो भरूँगा ।
अध्यात्म औ साहित्य से काम ना चलेगा ।
इससे न मेरा परिवार पलेगा ।
माँ शारदा की छबि मन में आई ।
बिल्कुल वही जिस पर थी कविता बनाई ।
इक पल को फिर से मन उनका डोला ।
पर बच्चे के आँसू से जब दुख को तोला ।
तो सब भूल कर बस निकले वे बाहर ।
तब से खोजते हैं कुछ जा इधर से उधर ।
उम्मीद है उन्हें कुछ तो मिल जायेगा ।
कोई साहित्य प्रेमी तो काम आयेगा ।
घर में ठीक से चूल्हा जल पायेगा ।
कवि फिर कोई कविता रच सुनाएगा ।
कुछ नहीं तो अपनी कहनी ही गाएगा ।
पर इस बार शायद हँसी की जगह वह,
आँसू का वितरण कर-कर के जाएगा !
सरस्वती जोशी
वह हँस-हँस के आगे लिखते गये ।
भूखे पेट, पानी पी-पी कर भी,
हमको साहित्य रच हँसाते गये ।
वाह-वाह के नशे में डूब,
अपने होश गँवाते गये ।
बीबी की बुड़बुड़ हुई,
बच्चे ने गुहार लगाई ।
पर यह आवाज़ें उसको,
इक पल भी रोक न पाईं ।
कर अनसुना, गैरों के दुखों को अपना बना,
कर-कर के वर्णन बताते रहे ।
कभी आलनी की भाजी औ मक्की की रोटी,
कभी राब पी कर घर चलाते रहे ।
जनता को इससे मतलब नहीं था,
वह कविता से सब को हँसाते रहे ।
सब सुन-सुन के ताली बजाते रहे ।
उन्हें तान पर सब चढ़ाते रहे ।
घरवाले आँसू बहाते रहे ।
निकम्मा मान ताने सुनाते रहे ।
कविताओं पे कविताएँ आती रहीं ।
पर एक दिन अचानक कुछ होश आया !
बेटे का फटा कुर्ता नज़र आया,
तो शरमा गये ख़ुद पर ही रोष आया ।
पैबंदों से भरी थी पत्नी की साड़ी !
नही ! नहीं चल सकती यूँ मेरे घर की गाड़ी ।
राब में कुछ और पानी बढ़ गया,
तो वाह-वाह का सारा नशा झड़ गया ।
अपनों पे लिखने को कलम थी उठाई ।
पर कागज़ पे पड़े आँसू से फैल गई स्याही ।
तोड़ कर कलम घर से गये निकल ।
उर में थी हलचल, मन था विकल ।
नहीं ! अब नहीं, मैं सब छोड़ दूँगा ।
कहीं नौकरी या कुछ भी करूँगा ।
बीबी औ बच्चों का पेट तो भरूँगा ।
अध्यात्म औ साहित्य से काम ना चलेगा ।
इससे न मेरा परिवार पलेगा ।
माँ शारदा की छबि मन में आई ।
बिल्कुल वही जिस पर थी कविता बनाई ।
इक पल को फिर से मन उनका डोला ।
पर बच्चे के आँसू से जब दुख को तोला ।
तो सब भूल कर बस निकले वे बाहर ।
तब से खोजते हैं कुछ जा इधर से उधर ।
उम्मीद है उन्हें कुछ तो मिल जायेगा ।
कोई साहित्य प्रेमी तो काम आयेगा ।
घर में ठीक से चूल्हा जल पायेगा ।
कवि फिर कोई कविता रच सुनाएगा ।
कुछ नहीं तो अपनी कहनी ही गाएगा ।
पर इस बार शायद हँसी की जगह वह,
आँसू का वितरण कर-कर के जाएगा !
सरस्वती जोशी