Tuesday, December 30, 2014

जब हम रो पड़े थे यूँ ही अनायास ।

नव वर्ष मंगलमय हो !सरस्वती जोशी
दुआ
जब हम रो पड़े थे यूँ ही अनायास ।
तब सोचा नहीं था कौन खड़ा है पास ।
पर जब कई आँखों की नमी देख हमें होश आया ।
तो सच मन दुखी हुआ कि हमने इतनों को रुलाया ।
माफ़ करना हमें मित्रो ! हमारा यह करना सही नहीं था ।
हँसी दें न दें, पर गमों का वितरण तो करना ही नहीं था ।
हम निपट स्वार्थी हैं, सो कहेंगे ज़रूर जो बात मन में है आई ।
आप से आई करुणा की बूँदों ने हमें अजब तसल्ली है दिलाई ।
हम अकेले नहीं अबसे, कोई है अपना कह पायेंगे ।
गर आये कोई विपदा तो अवश्य पार कर जायेंगे ।
डूबने से पहले यदि हम फैलायेंगे हाथ ।
तो है विश्वास कुछ मित्र आ दे देंगे साथ ।
अगर हमने बेबस हो मदद को पुकारा ।
तो रहने न देंगे वे हमें निपट बेसहारा ।
कैसे करें अदा इस मित्रता का शुक्रिया !
आप के लिये होगी बस हमारी हर दुआ !
- सरस्वती जोशी

Monday, December 29, 2014

मेरी सासजी स्वर्गीया श्रीमती तुलसी देवी शास्त्री को सादर समर्पित -

मेरी सासजी स्वर्गीया श्रीमती तुलसी देवी शास्त्री को सादर समर्पित -
म्हैं तो सुणी रे ! म्हैं तो सुणी रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो मन को रे मोहन !
जो मेरो मनड़ो लुभा ले तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो घट-घट वासी !
जो मोरे घट बस जावे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो तारण हारो !
जो म्हने तार बता दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो बड़ो रे केवटियो !
जो म्हने पार लगा दे तो जाणूँ रे !
म्हें तो सुणी रे थूँ तो लाज बचावै !
जो मेरी लाज बचा दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थें तो गीता रचाई !
जो म्हने ज्ञान सिखा दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो दीनाँ को वत्सल !
जो मो सो दीन बता दे तो जाणूँ रे !
हे दीनानाथ ! थारा शरणा में आई हूँ !
जो मेरो हाथ पकड़ ले तो जाणूँ रे !
दरश की प्यासी कद से द्वार खड़ी हूँ !
जो मोंहे दरस दिखा दे तो जाणूँ रे !
हे करुणाकर ! कद से पुकारूँ रे !
जो म्हने परचो दिखा दे तो जाणूँ रे !
सरस्वती जोशी

हे मनमोहन !

हे मनमोहन ! थारा चरणाँ में आई हूँ,
गोविंद-माधव ! मोसे मुख मत मोड़ो रे !
टूटी-सी नाव मझधार में अड़ी है,
करुणाकर ! पतवार मत छोड़ो रे !
भव-सागर को गेहरो-गोहरो पाणी,
डूबे है नाव हरजी ! जल्दी से दौड़ो रे !
पकड़्यो है नाथ ! म्हैं तो थारो सहारो,
भगत-वछल ! पार कर दो नी बेड़ो रे !
हे रघुनंदन ! म्हैंतो दासी हूँ थारी,
दीनदयाल ! मोसे नातो मत तोड़ो रे !
सरस्वती जोशी

Tuesday, December 16, 2014

उनकी तस्वीर

उनकी तस्वीर
आज फिर मुस्कुराये उनकी तस्वीर में उन्हें पाने के लिये ।
आँसुओं ने बहने का तकाजा किया हमें रुलाने के लिये ।
हालाँके समंदर के खारे जल को पी पाना इतना सरल नहीं !
फिरभी हम पीने लगे उसे चुपचाप दर्द छिपाने के लिये ।
कुछ पल को मधुर स्मृतियों में डूब जाने के लिये ।
खुद हँस कर उन्हें फिर अपने साथ हँसाने के लिये ।
लेकिन विफल हो गये हम, बूँदें टपकने ही लगीं तस्वीर पर !
उन्हें पोंछने के प्रयास में सुखाते रहे अपने अंतर में भरा समंदर !
- सरस्वती जोशी

Sunday, December 14, 2014

शब्द बाण

शब्द बाण
कभी-कभी कुछ लोगों के,
शब्द बाण चुभ जाते हैं ।
चीर हमारे सीने को,
रक्त-धार बहाते हैं ।
रोक न पाते हैं निज को तो,
शब्दों का जाल बनाते हैं ।
कुछ अच्छी-सी मीठी बातो से,
उन घावों को सहलाते हैं ।
फिरसे वार न कर दे जगती,
यह सोच-सोच डर जाते हैं ।
इसीलिये मुस्कानों से भर,
मृदु-मधुर शब्द सुनाते हैं ।
भर शालीनता की रस धार,
वाणी का पाठ पढ़ाते हैं ।
शायद खुद को ही बहलाने को,
हम रिसता दर्द छिपाते हैं ।
उर की पीड़ा के दंशन से,
जब व्याकुल से हो जाते हैं ।
तो केंद्रित कर अपने मन को,
विष अमृत सम पी जाते हैं ।
कब तक सहें यह भार भला
जब घावों की पहल जगती से आई ।
हमने तो मूक शालीन भाव से,
केवल मन की बात बताई ।

Saturday, December 13, 2014

जीवन के रंग

जीवन के रंग
विश्व के चित्रपट पर देखते हैं,
नित्य इस जीवन को ।
जो लगता है चलचित्र सा ।
देता है आभास जैसे,
हो किस्सा किसी और का ।
अनजान से राहगीर का ।
जिसको नहीं हम जानते ।
अपना नहीं हम मानते ।
न वैसी लगती उसकी कथा ।
जिसकी थी हमें अपेक्षा ।
सहसा नेत्रपट खुल जाते हैं ।
उसके अनगिन पात्रों के बीच,
कहीं ख़ुद को ही खड़ा पाते हैं !
वेदना से भर कर,
कुछ सहम से जाते हैं !
फिर उसमें दिखते हुए,
किसी भग्न हृदय मानव पर,
हँस नहीं हम पाते हैं !
उस चल चित्र में जीवन के,
विभिन्न रंग दिख जाते हैं ।
हर रंग का कोई निशाँ,
हम अपने वसनों पर पाते हैं !
इन रंगों के भ्रमरजाल में,
कुछ ऐसे खो जाते हैं ।
के अपने-पराए का भान भूल,
सब रंगों में समा जाते हैं ।
ऐसे ही फँस कर भ्रमित हो,
संपूर्ण जीवन बिताते हैं ।
जग कर्ता की इस माया को,
समझ नहीं हम पाते हैं !
गर कभी भाग्य चमक उठता,
औ ज्ञान प्रकाश को पाते है ।
जाने क्यों कर अवहेलना,
हो मौन कहीं सो जाते हैं ।
जब जगते हैं तो होता है,
अपनी भूलों का आभास ।
पुन: एक मौका पाने का,
करने लगते हैं प्रयास ।
पर भूल-सुधार का मौका,
सबको नहीं मिल पाता है ।
और यूँ ही पछताता मानव,
छोड़ जगत को जाता है ।
पुन: प्रकट होने की आस में ।
अगली बार सतर्क रहने के,
मन में बँधे विश्वास में ।
पर "अगली बार" कब होगी ?
होगी भी या नहीं होगी ?
कोई नहीं है जानता ।
फिरभी मानव जाने क्यों,
सत्य को पहचान कर भी,
उन सत्यों से दूर भागता !
अंत:करण की आवाज़ तक को,
सुनकर भी नहीं मानता ।
- सरस्वती जोशी

Monday, December 8, 2014

असफल प्रणय के बंधन (हर पीड़िता नारी को)

असफल प्रणय के बंधन (हर पीड़िता नारी को)
परंपरा के आदर से, या आधुनिकता के जोश से,
जाने या अनजाने से, या किसी दबाव से या रोष से,
ग़रीब मांं-बाप के पास हुई पैसों की कमी से,
या उनकी आँखों से बिखरी नमी से,
जाने कितने कारण हैं, जिनके घेरे में फँस गये ।
कुछ ऐसे प्रभावित से हुए, ग्रह चक्कर में धँस गये ।
ऐसे बंधन में बँध गये गये जो तकदीर को भाये नहीं ।
किसी तरह जाल से निकले मगर पूरे निकल पाये नहीं ।
काले साये स्मृतियों के मन पर ऐसे असर करने लगे ।
हँसने के सारे द्वार मानो सहसा ही बंद से दिखने लगे ।
असफल प्रणय के बंधन टूटे पर ऐसी छापें छोड़ गये ।
के बाकी जीवन के हर सपने की सारी उमंगें तोड़ गये ।
माना के यह सच है अक्सर प्राणी संग ऐसा ही होता है ।
पर क्या जीवन का यही मूल्य ? क्या यह इतना सस्ता होता है !
किसी एक के प्यार में बँध कर इतने गुलाम हो गये,
कि जीवन भर केलिये प्यार के शब्द ही बदनाम हो गये ?
अब आगे किसी का कैसा भी सरल स्नेह हो !
उर में कही भरा करुणा का मेह हो ।
उसे अपनी ओर आते देख कर ही डरते हो !
क्या अभी भी तुम उस अन्यायी पे मरते हो ?
गर नहीं तो क्रोध क्यों स्नेह के खिलाफ ?
किसी का क्रोध किसी पर यह भला क्या बात !
गर किसी एक ने किया कभी था छल ।
तो क्या तोड़ लोगे अपना ही मनोबल ?
भूलना अतीत को होता नहीं सरल !
पर खोओ वर्तमान को क्या यह इसी काबिल ?
जो नहीं तो सर पर यह काली सी चादर किस लिये ?
किसके लिये ? किस संताप में ? क्यों ? किसकी आस में ?
ये मनोबल को गिराने वाले साधन-प्रसाधन किस लिये ?
जो डिज़र्व नहीं करते उनके लिये ? उनके डर से ?
या उर में उठते आक्रोष के निर्झर से ?
यह उदासी की ओर जाती राह क्यों ?
यह दीन बन याचना में बढ़ी बाँह क्यों ?
उठो ! तुम किसी की माँ हो, बेटी हो, बहन हो, सखी हो !
कितना कुछ पास है उसे क्यों खो रही हो ?
- सरस्वती जोशी

वे चुभते शूल

वे चुभते शूल
उन पथ के काँटों को,
या उन्हें बिछानेवालों को धन्यवाद कैसे बोलें ?
उन शूलों को "अनायास ही आई बाधा" कर-कर के कैसे तोलें ?
है मालूम हमें के उनको सोच-सोच बिछाया था ।
पग-पग पर इसी तरह से यह मार्ग अगम्य बनाया था ।
उन्हें पार करने में आँचल आँसू से भर-भर आया था ।
पग-पग पर गिरते अश्रु देख, मुक्त कंठ से उपहास उड़ाया था ।
हमें रोकने का एक सबल, दृढ़ स्वप्न भी सजाया था ।
बेबस से होकर मदद हेतु यह हाथ भी बढ़ाया था ।
पर हमने अपने को उस पल में निपट असहाय ही पाया था ।
औ कर साहस आगे बढ़े तो कदम भी लड़खड़ाया था ।
माना के आज उन्हीं काँटों से, कंटक पर चलना सीख लिया।
शक्ति जुटाने की ट्रेनिंग पा, मार्ग बनाना सीख लिया ।
पर उनसे उभरे घावों का उपचार कहीं ना मिल पाया ।
उस पीड़ा को हर पाये ऐसा वैद्य नज़र नहीं आया ।
फिरभी उन चुभते शूलों को सादर शीश झुकाते हैं ।
उनसे रिसता दर्द सदा ही इन रचनाओं में पाते हैं ।
- सरस्वती जोशी

मोह का भ्रम-जाल

मोह का भ्रम-जाल
जब वे आये थे जीवन में, तो उनके प्रथम दर्शन ने ही,
कुछ ऐसा अहसास दिया के हमें अपना, अपने,
अपनी मंजिल, सब कुछ उन्हीं में दिखने लगा । 
जग औ जग को मान मिथ्या, अनासक्त बन जीने का,
हर बार, हर उपदेश हमको फीका सा लगने लगा ।
मान अपने जप-तप का फल, हम उनमें ही डूब गये ।
दिन महीने बरस कितने बस ऐसे ही बीत गये ।
भूल कर हर सत्य जगत का सब सपने उनसे जोड़ दिये ।
अपने हँसने के सब बहाने बस उनकी दिशा मे मोड़ दिये ।
उनमें ही रब दिखने लगा, बाकी सब अरमाँ छोड़ दिये ।
रिश्तों के उस मोह-जाल में प्रभु से भी नाते तोड़ लिये ।
भूले क्षणभंगुर जीवन की बातें, उनने कुछ ऐसा प्यार दिया ।
जग के मोह में भ्रमित हुआ मन, हर अरमाँ उन पर वार दिया ।
पर धीरे-धीरे, जैसे-जैसे रिश्तों की परतें खुलती रहीं ।
सत्य का प्रकाश बिखरा मन में, आशा की धूनी जलती रही ।
हर परत को खुलते देख, पीड़ा की कसक जब हुई।
प्रश्नों का इक जाली सी आ-आ सामने बिछती रही ।
मानते हैं हमें इसका अहसास होना चाहिये था ।
बन कर के दूरदर्शी, सजग रहना चाहिये था ।
हम मोह-जाल में फँसे-फँसे शोषित होते ही रहे ।
माना हमारी मूर्खता थी, हम अपना सब खोते ही रहे ।
आया अचानक होश जब औ नींद से आँखें खुलीं ।
परोपकारिता, दया-धरम के उदेश खोखले से लगे ।
किस पर भरोसा करें किस पर नहीं ? ये प्रश्न उठने से लगे ।
हर खुलता परत, नया अनुभव ले, स्पष्ट सामने आ-आ कर,
नये सिरे से खोल रहा था नई जड़ता की कहानी ।
चकित उदास विकल हृदय से, आँसू से घावों को धोकर,
अबसे बुद्धू ना बन, कुछ साँसें निज हेतु ही जीने की हमने ठानी ।
हालाँ के संकल्प लिया था हमने, पर सत्य तो कुछ और है ।
निभा नहीं पाये हम उसको, संकल्प टूटता ही रहा ।
फिर कोई नई आस, मिथ्यापन होने पर भी ज्ञात,
हावी सी होती रही औ निज हेतु जीने का वादा पीछे छूटता ही रहा ।
बस अरमानों को पूरा करने को, उनमें ही लीन होते गये ।
अपने लिये सोचे क्षण सारे आगे सरकते ही गये ।
हर वर्तमान के अमूल्य क्षण औरों को देते ही गये ।
पड़ भ्रम में कभी भाई, कभी बहन, कभी बेटा, कभी बेटी,
कभी कुछ और नाम आ-आ कर के सूची में जुड़ते ही गये ।
सब कुछ दूरी तक के हमसफर ! दूर होते ही गये ।
और जब आँखें खुलीं तो निपट तन्हा रह गये ।
घिर आई है शाम औ दूर बहुत है अभी किनारा ।
सुध तो आ गई तारक की, हमने उसे है पुकारा ।
पर पूछ रहा है आज हमसे बार- बार हृदय हमारा :
"क्या उसको बुद्धू समझा है, क्या वह आ देगा सहारा ?"
- सरस्वती जोशी

जीवन के सत्य का अहसास

जीवन के सत्य का अहसास
हर जाती साँस के साथ,
हर अधूरी आस के साथ,
जीवन के सत्य का,
होता जाता है अहसास ।
घटता जाता है जिंदगी का दायरा ।
अनपढ़ हो या हो विद्वान ।
उसे हो जाता है इसका ज्ञान ।
फिर भी उसके मन में रह जाती,
इक अनबुझी सी प्यास ।
कभी कुछ और पाने की कामना,
कभी कुछ खो जाने का भय ।
आँखों में भरा समंदर,
जीता है मन में ले कर संशय ।
हर पग पर माँगता जगत से मुक्ति ।
फिर भी जीने की साध में लगाता,
कर-कर संचय सारी शक्ति ।
विचित्र सी विडंबना है ।
फिर भी उसको जीना है ।
सब संत मार्ग बताते हैं ।
जग मिथ्या समझाते हैं ।
हर प्राणी मन में जानता है ।
फिर भी न इसको मानता है ।
काश प्रभु न बुनते यह माया-जाल ।
तो सत्य को समझ कर मानव,
बदल पाता अपना कुछ हाल ।
- सरस्वती जोशी