Sunday, November 30, 2014

मित्रों का आभार

मित्रों का आभार 
मेरे मित्रो ! आप सबने जाने या अनजाने में,
पता नहीं पर कितने तन्हाई के क्षणों को आबाद किया।
कितने अश्रु भरे उदास पलों को अपनी हँसी से भर दिया ।
इन स्नेह सिक्त माधुर्य भरे हर क्षण का यह सुंदर उपहार ।
जो अविरत देते रहना सबने किया हँस-हँस सहर्ष स्वीकार ।
इसमें जो अपनत्व भरा उसमें कुछ ऐसी हमदर्दी है घुली ।
इस मानस पर छाती निराशा औ गिरते मनोबल को,
अपना मान हाथ पकड़ने से शक्ति अलौकिक है मिली ।
इन अमूल्य स्नेह कणों का मानूँगी सदा आभार ।
अपने अंतर मन से भेजूँगी दुआएँ अनेक बार-बार !
- सरस्वती जोशी

Friday, November 28, 2014

क्यों आते वे िदन िफर याद ?

क्यों आते वे िदन िफर याद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
कहते सब: "बीती बातों को भूलो, मत वह बात करो ! "
जो कुछ पाया है मधुमय, बस उसको तोलो माप करो..." 
िफर इस मधुमय रस के भीतर, लगता क्यों कुछ कड़वा स्वाद ! ...
सुनते हैं : "है प्यार भरा, यह रसमय सारा ही संसार ।
जीवन है हँस-हँस जीने को, करते जाअो सब को प्यार ।"
हँसते-हँसते ही आ जाता, क्यों िफर नयनों में यह खार ! ...
सुनते जब उपदेश िकसीके, सीने में क्यों उठता ज्वार ?
क्यों इस मन का कोई कोना, व्याकुल हो करता चीत्कार ?
क्यों मन करता कोई सुन ले, कभी बैठ कर मन की बात ? ...
क्यों दे कोई भला िकसीको, अपनी मुस्कानों के कुछ क्षण ?
िफर भी जाने-अनजाने में, यही चाहता है पागल मन ।
कहीं िमले कोई अपना जो, दे दे कुछ क्षण की सौगात ! ...
िकतना चाहें अब न करें हम, कभी कहीं दुखड़े की बात ।
झोली भर मुस्कानों की हम, खुिशयों की कर दें बरसात ।
पर िनर्धन के बस में है क्या, दे दे मुस्कानों का मोल ?
कैसे चुकाए, कैसे पाए, कौन सुने उसकी फरियाद ?...
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
- सरस्वती जोशी

Friday, November 14, 2014

प्रात:कालीन पूजन

प्रात:कालीन पूजन
बहुत देखते हैं हम हर रोज़ सुबह आते हुए संदेश ।
कितने रसों का भरा होता है इनमें समावेश ।
कितने ही विविध विचार, कितने सारे समाचार । 
कितनी कविताएँ, कितने गाने, कभी नये, कभी पुराने ।
कितने हँसी के गुंजन । कितने शोक भरे क्रंदन ।
वृद्धों का हर लेते एकाकीपन । युवकों का करते मनोरंजन ।
नीति धर्म की लिख हर शिक्षा, देते हैं ये अद्भुत दीक्षा ।
किंतु न जाने क्यों कुछ ऐसा है जिसे मैं ढूँढती हूँ बार-बार ।
लेकिन वह मुझे दिखता है बस केवल कभी-कभार ।
आज सुबह ही पढ़ने में आया : "सब चिंताओं से मुँह मोड़,
सारी झंझटबाजी छोड़, हर टेंशन से नाता तोड़ ।
बस हरि की तुम करो साधना, हो जाएगा सच हर सपना ।..."
सच में मन को बहुत ही भाया, हाथ जोड़ कर शीश नमाया ।
सोचा : बच्चों को भी पढ़वाऊँ, यह सुंदर संदेश सुनाऊँ ।
पर कर न मैं ऐसा पाई, लगा : अभी न इसकी उमर आई ।
यह समय है भावी-निर्माण का, पुस्तकों में बसे ज्ञान का ।
बस वही इनका भगवान है, इसमें ही इनका कल्याण है ।
अब न बीसवीं सदी रही, कि काम मिल जायगा कहीं न कहीं ।
अंकों का हर प्रतिशत ही है अभी तो इनकी हर माला ।
गणित का हर सवाल ही है इनकी तो बस कर माला ।
उसी में बसा इनका भगवान । अच्छे अंक ही गीता का ज्ञान ।
सोचते समय मन में हुआ कुछ कंपन ।
फौरन प्रभु के आगे था किया नमन ।
गीता की पुस्तक भी उठाई । बार-बार सर से लगाई ।
मन ही मन की क्षमा याचना । भय वश की कुछ अजब कल्पना ।
पर जो उर में बात उठी उसको मिटा नहीं पाई ।
क्योंकि मन कहता यही रहा : "यही इस युग की सच्चाई ।"
छोड़ गीता व मास-पारायण, लिया हाथ में इंगलिश व्याकरण ।
छोड़ सुबह का सब पूजन, बच्चों को करवाने लगी रिवीज़न ।
कुछ मन में खटका भी आया । कुछ मन भारी सा हो आया ।
पर लगा कि मेरे मेडिटेशन का समय अभी तक नहीं है आया ।
अनायास कुछ गया मिल । मन मेरा सहसा गया खिल ।
लगा मानो पूरे हो गये मेरे सभी माला औ जप ।
जैसे मेरे लिये यही वह मार्ग कहते जिसे हैं सब तप ।
बच्चों से जिसका पाठ कराया । माँ शारदा का ध्यान धराया ।
हर शब्द जो मैंने पढ़ाया । उसमें ओम नज़र आया ।
गायत्री का था गुंजन । सरस्वती का था वंदन ।
अजब शांति का आभास था । चारों ओर प्रकाश था ।
बहुत शांत था मेरा मन । मानो कर लिया पूजन ।
पूर्ण हो गया जैसे पारायण । मिल गये मानो मेरे मन-मोहन ।
- सरस्वती जोशी

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)
हे प्रभु ! तुझे मन से अपना मानने पर भी,
न जाने क्यों कुछ प्रश्न मुझको सताते हैं बार-बार ?
अपनी करुणा का दान देने से पहले,
मुझे इस कदर झुकाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
कुछ कण मुस्कुराहट के देने से पहले,
मुझे इस कदर रुलाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपना वरद हस्त मेरी ओर बढ़ाने से पहले,
मुझे इस कदर तरसाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपनी मुरली का मधुर संगीत सुनाने से पहले,
मेरा विरह राग गाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
- सरस्वती जोशी

दूध को रोता बालक

दूध को रोता बालक
"दूध-दूध !" कह रोता बालक, माँ के आँचल में चिल्लाया ।
धरती तो धरती, अंबर तक उसके क्रंदन से थर्राया ।
विद्युत का वज्र कठोर हिया, इक पल करुणा से भर आया ।
पर मानव को मानव-सुत की, इस दीन दशा का होश न आया ।
हे शिव शंकर ! बस यह बतला यह कैसी तेरी माया ?
तूने भेज जगत में उसको, कैसा प्रभुवर खेल रचाया ?
- सरस्वती जोशी

Thursday, November 13, 2014

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)
हे प्रभु ! तुझे मन से अपना मानने पर भी,
न जाने क्यों कुछ प्रश्न मुझको सताते हैं बार-बार ?
अपनी करुणा का दान देने से पहले,
मुझे इस कदर झुकाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
कुछ कण मुस्कुराहट के देने से पहले,
मुझे इस कदर रुलाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपना वरद हस्त मेरी ओर बढ़ाने से पहले,
मुझे इस कदर तरसाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपनी मुरली का मधुर संगीत सुनाने से पहले,
मेरा विरह राग गाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
- सरस्वती जोशी

Tuesday, November 11, 2014

ये खोये लम्हे

ये खोये लम्हे
जिंदगी के जो पहलू पुस्तकें सिखा सकती थीं ।
जिस दिशा में हाथ पकड़ हमको ले जा सकती थीं ।
हम उनके ज्ञान भरे शब्दों को पूरा सुन पाये नहीं ।
उनमें भरे संगीत स्वर ख़ुश हो गुनगुनाये नहीं ।
जग के इंद्र धनुषी जालों को पूरा समझ पाये नहीं ।
वक्त पर उनके बंधन से बाहर निकल पाये नहीं ।
आज जब ये जाल सारे हैं स्वत: ही टूट गये ।
वे सारे आकर्षक बंधन हैं कहीं पीछे छूट गये ।
जीवन के कटु सत्य सामने आ खड़े बन कर विशाल ।
तो हर बीता पल खड़ा सामने लिये हुए प्रश्नों के जाल ।
अतीत की हर शिक्षा जिसे हमने नगण्य था माना ।
उसका हर महत्व प्रकट हो प्रश्न पूछता मनमाना ।
अब तो सब कुछ समझ चुके हैं, चाहें : सपने हों साकार ।
पर जो खोया उसको पा लें फिर से यह आशा तो है बेकार ।
जो खाई हम बना चुके अब उसको तो भर नहीं सकते ।
जो कमी रख दी जीवन में उसको पूरा कर नहीं सकते ।
खीज आती है खुद पर ही मानव जीवन खो देने पर ।
सुरभित गुलाब की जगह यहाँ केवल काँटे बो लेने पर ।
अतीत की हर क्षिक्षा आ कर खड़ी सामने कुछ पूछ रही ।
पर कैसे कुछ बोलें अब उससे है उसकी हर बात सही ।
जो बीत गया वह तो हमको वापस कभी न मिल पायेगा ।
यह जीवन तो अब ऐसे ही यूँ पछताने में ही जाएगा ।
गर प्रभु फिरसे देख दया दे देगा हमको मानव का तन ।
तो शायद अगले जनम में कर पाएँ कुछ ऐसा साधन ।
के मानव-जीवन यह हमारा सफल जीवन कहलाए ।
ऐसी स्मृतियाँ कुछ छोड़ सकें जो लोगों को याद आएँ ।
मोक्ष क्या है नहीं जानते लेकिन यह सदा से हैं सुनते ।
जो जीवन में कुछ कर जाते वे मर कर भी नहीं मरते ।
हे प्रभु ! तुम से विनय यही : इतनी करुणा तुम कर देना ।
थोड़ा कुछ जग में कर पायें, बस एक जनम फिर दे देना ।
- सरस्वती जोशी

Sunday, November 2, 2014

माँ के समान हितैषी नहीं, माँ के समान गुरु नहीं !

माँ के समान हितैषी नहीं, माँ के समान गुरु नहीं ! 
एक बहुत धनवान, धर्मात्मा, सर्वगुण संपन्न व्यक्ति था । उसकी वृद्ध माँ उसके साथ रहती थी । वह अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता था । माँ की हर ज़रूरत पूरी करता, लोग उसकी बहुत सराहना करते थे । एक दिन उसकी माँ को यह आभास हुआ कि बेटे को कुछ गर्व होने लगा है तो माँ ने कहा : "बेटे! क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे जीवन की इस अद्वितीय सफलता का रहस्य क्या है ? तुम्हारे पिता एक महात्मा थे । जब मैं गर्भवती हुई तो पूरे दिन होने पर उन्होंने मुझको बताया कि यदि अमुक दिन, अमुक समय पर बालक हुआ तो वह बहुत भाग्यशाली होगा । लेकिन उनके बताए समय से कुछ समय पहले ही मेरे प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो गई । मुझे पता चला कि यदि इन कुछ घंटों में बालक हो गया तो वह मंद-बुद्धि व मंद-भागी होगा । तो मैंने दाई को बुला कर कहा : "तुम मुझे पैर ऊपर करके उल्टा लटका दो, कुछ भी हो जाए, मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, पर अमुक समय से पहले मेरे बच्चा नहीं होना चाहिये ।" दाई मेरे कहने के अनुसार करती रही और मैं प्रसव पीड़ा सहती हुई शुभ समय की प्रतीक्षा करती रही । धीरे-धीरे शुभ घड़ी आई और शुभ ग्रहों में तुम्हारा आगमन हुआ । बेटे ! मैंने तुम्हारे कल्याण हेतु जो पीड़ा सही तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते सो यदि तुम मेरे साथ यह सदव्यवहार मेरा रिण चुकाने की मंशा से कर रहे हो तो वह रिण तुम कभी नहीं चुका पाओगे । यदि तुम मेरे लिये जो कुछ भी कर रहे हो वह मेरे प्रति स्नेह के वशीभूत हो कर कर रहे हो तो मैं तुम्हारे इस स्नेह की सदा रिणी रहूँगी और मुझे सदा तुम पर गर्व होगा, पर यह मत भूलना कि संसार का कोई भी पुत्र माँ का रिण नहीं चुका सकता ।" माँ की बात सुन कर बेटा बोला : "माँ ! तुझे कैसे पता चला कि मेरे मन में सचमुच गर्व का बीजारोपण होने लगा था ? सच ही कहा है कि माँ के समान कोई हितैषी नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं !
- सरस्वती जोशी