Thursday, October 30, 2014

जीवन पथ के विभिन्न आयाम,

जीवन पथ के विभिन्न आयाम,
हमें याद आते हैं !
वे हमें याद आते हैं !
आते चले जाते हैं ।
अतीत के पल फिर से आ कर, 
स्मृतियों में स्थिर हो जाते हैं ।
और आज भी हम उनको,
कभी हँस कर जी पाते हैं ।
कभी पलकों में भर उनको,
चुप-चुप ही पी जाते हैं !
और जीवन के बदलते से रंगों में,
जाने कहाँ खो जाते हैं !
कभी कभी कुछ कहते हैं :
अतीत के पल अतीत हो जाते हैं ।
लेकिन वे फिर अनायास ही,
स्मृतियों में लौट आते हैं ।
अपना महत्व जताने को ।
कभी रोतों को हँसाने को ।
कभी हँसतों को रुलाने को ।
कभी निराशा में डुबाने को ।
कभी सोई आस जगाने को ।
मन करता उनसे दूर रहें ।
क्यों बीती यातना फिर से सहें ?
पर वे हावी से हो जाते हैं,
अपना प्रभाव दिखाने को ।
प्राणी को अतीत से जोड़,
फिर पीछे ले जाने को ।
या फिर उसे उत्साह दिला,
कुछ आगे को बढ़ाने को ।
उर की सुप्त चेतना को,
झकझोर कर जगाने को ।
अपनी विचित्र माया से,
मन को भ्रमित बनाने को ।
भूत और वर्तमान में,
एक कड़ी बन जाने को ।
शायद इसीलिये उसको,
भूत की संज्ञा देते हैं ।
प्रयत्न कर कर के ख़ुद को,
दूर बनाये रहते हैं ।
- सरस्वती जोशी

काश हर होनेवाला अहसास,

काश हर होनेवाला अहसास,
अहसास न रह सत्य बन जाए !
जिसके लिये हम तड़पते हैं,
वह और कुछ नहीं तो सपने में आ जाए ।
कुछ पल जीवन के मुस्कुराते गुजर जाएँ ।
कुछ स्वप्न हकीकत में बदल जाएँ ।
सुनते हैं वे गोपियों के सपनों में आते थे ।
राधा के आँसू दुपट्टें से पोंछ जाते थे ।
काश कभी हमारे आँसू भी दिख जाएँ ।
करुणा के कुछ कण इधर भी बिखर जाएँ !
तो जगती में आना अपना सफल हो जाए ।
इस मन के अरमान अधूरे न जाएँ ।
पर हर सपना कभी साकार नहीं होता ।
हर अधूरा अरमाँ आकार नहीं लेता ।
जानते हैं हम और खुद को समझाते हैं ।
लेकिन वही भ्रम बार-बार उभर आते हैं ।
जाने क्यों जगती की यह विचित्र रीत है ।
हारती सदा से आई हर "प्रीत" है ।
- सरस्वती जोशी

Friday, October 17, 2014

क्या सारे गमों को जगती लिख पाती है ?

क्या सारे गमों को जगती लिख पाती है ? 
क्या दीवारें परदुख समझ पाती हैं? 
मैंने सुना : वे रोती नहीं, तत्काल ही औरों को सुनाती हैं ।
परदुख को परिहस की सामग्री बनाती हैं ।
उन हासों-परिहासों से नींद और जल्दी जग जाती है । 
उर को और अधिक विचलित सा कर जाती है ।
बस फिर आँखें नींद से दूर जा आँसू बहाती हैं ।
दीवारों की कठोरता पर चकित सी हो जाती हैं ।
और अपने भोलेपन पर मन ही मन पछताती हैं ।
- सरस्वती जोशी

Saturday, October 11, 2014

एक कवि का जीवन

एक कवि का जीवन 
तुम बसोगे घर-घर के नित्य के इतिहास में । 
हर घर के हर सदस्य के हर अश्रु में हर हास में । 
चाहे तुमने बन केशव-सूर उनसे ऊँचे पद ना पाये । 
चाहे बना दूत मेघों को प्रेम संदेशे ना भिजवाए । 
सीता के संग बैठ कुटी में लव-कुश के संग खेल न पाए ।
पर तुमने हर टूटी छत के नीचे जा-जा उसके दर्द बँटाए ।
लेखनी है तुम्हारी जिस पीड़ा का अनुभव कर रही ।
वह केवल गीतों का विषय नहीं, वही जीवन का सत्य सही !
- सरस्वती जोशी

Wednesday, October 8, 2014

प्रेम की याचना

प्रेम की याचना 
क्यों माँगें हम याचक बन-बन हर समय प्रेम की भीख ? 
क्या वेदना की तड़प से नहीं पाये हम कुछ सीख ? 
क्यों न रँगलें चुनर अपनी हम स्वयं खुद के लिये ? 
क्यें न हम ख़ुद ही जलालें अंत:पुर में कुछ ऐसे दिये ?
कि फिर न तरसे उर हमारा यूँ किसी के भी लिये !
क्यों करें यह पराधीनता इस तरह झुक कर स्वीकार ?
कि कर सके कोई हमारा इस तरह इतना प्रतिकार !
क्या जीवन नाम इसी का है, करते रहें अपना समर्पण ?
और बदले में मिले पग-पग पर विरह की ज्वलित तपन !
नहीं ! अब और नहीं ! यह एक तरफ का अविरत अर्पण !
एक तरफा मिलते सदा से ये निरंतर थोपे बंधन !
हम मुक्त हो कर साँस लेंगे इक स्वच्छ नीले से गगन में ।
अब नहीं यूँ हम धरेंगे शीश झुक-झुक कर चरण में ।
माना वे उन्नत शिखर से, विशाल नील अंबर से हैं ।
पर हम भी धरा से धैर्यवान, गंभीर विस्तृत सागर से हैं ।
अब न हम यूँ याचना कर-कर झोली को फैलाएँगे ।
गर पड़े चलना अकेले तो वह भी हम सीख जाएँगे ।
शक्ति कहलाते आये हैं क्यों भूलें यूँ अात्म-सम्मान ?
क्यों पग-पग पर भुगतें भला यह अवहेलना भरा अपमान ?
सरस्वती जोशी

Monday, October 6, 2014

जिनकी मैं सदा रिणी रहूँगी -

प्रोफेसर श्रीमती कैथरीन तोमा को सस्नेह,
जिनकी मैं सदा रिणी रहूँगी -
कुछ मित्र मिले ऐसे मिले जीवन में,
दे दिया कुछ यूँ सहारा ।
डूबती सी नाव को भी,
मिल गया अपना किनारा ।
उनको यह मालूम नहीं,
कर दिया कितना उपकार ।
केवल करुणा के वश होकर ही,
लगा दिया नैया को पार ।
उनके रिण से दबा है कोई,
यह भी ज्ञात नहीं उनको ।
केवल कुछ पल साथ रहे बस,
फिर ना मिले कभी हमको ।
जाने कौन राह पकड़ी फिर,
यह तक हमको नहीं पता।
दूर-दूर से भेजेंगे पर,
उन्हें दुआ अपनी सदा ।
-सरस्वती जोशी

समय उर का सहज सलिल छीन,

समय उर का सहज सलिल छीन, 
खारे अश्रु दे गया । 
वह चिंता मुक्त शांत से पल,
सारे चुन कर ले गया ।
जीवन का यथार्थ देख,
मन हमारा डोल गया ।
ज़िंदगी के सभी रिश्तों की,
परतें वह खोल गया ।
जीवन के हर पल का मोल,
एक पल में बोल गया ।
मिला हमे निज के अंतर से,
बता गया सत्य वह कितना !
औ समझ में आया यह जग,
है कितना विचित्र सपना !
सब में जहाँ वही ईश्वर,
है सबसे हमें जुड़ना ।
किंतु सच में न कोई अपना ।
सबसे हमें होगा बिछुड़ना !
- सरस्वती जोशी