जीवन पथ के विभिन्न आयाम,
हमें याद आते हैं !
वे हमें याद आते हैं !
आते चले जाते हैं ।
अतीत के पल फिर से आ कर,
स्मृतियों में स्थिर हो जाते हैं ।
और आज भी हम उनको,
कभी हँस कर जी पाते हैं ।
कभी पलकों में भर उनको,
चुप-चुप ही पी जाते हैं !
और जीवन के बदलते से रंगों में,
जाने कहाँ खो जाते हैं !
हमें याद आते हैं !
वे हमें याद आते हैं !
आते चले जाते हैं ।
अतीत के पल फिर से आ कर,
स्मृतियों में स्थिर हो जाते हैं ।
और आज भी हम उनको,
कभी हँस कर जी पाते हैं ।
कभी पलकों में भर उनको,
चुप-चुप ही पी जाते हैं !
और जीवन के बदलते से रंगों में,
जाने कहाँ खो जाते हैं !
कभी कभी कुछ कहते हैं :
अतीत के पल अतीत हो जाते हैं ।
लेकिन वे फिर अनायास ही,
स्मृतियों में लौट आते हैं ।
अपना महत्व जताने को ।
कभी रोतों को हँसाने को ।
कभी हँसतों को रुलाने को ।
कभी निराशा में डुबाने को ।
कभी सोई आस जगाने को ।
अतीत के पल अतीत हो जाते हैं ।
लेकिन वे फिर अनायास ही,
स्मृतियों में लौट आते हैं ।
अपना महत्व जताने को ।
कभी रोतों को हँसाने को ।
कभी हँसतों को रुलाने को ।
कभी निराशा में डुबाने को ।
कभी सोई आस जगाने को ।
मन करता उनसे दूर रहें ।
क्यों बीती यातना फिर से सहें ?
पर वे हावी से हो जाते हैं,
अपना प्रभाव दिखाने को ।
प्राणी को अतीत से जोड़,
फिर पीछे ले जाने को ।
या फिर उसे उत्साह दिला,
कुछ आगे को बढ़ाने को ।
उर की सुप्त चेतना को,
झकझोर कर जगाने को ।
क्यों बीती यातना फिर से सहें ?
पर वे हावी से हो जाते हैं,
अपना प्रभाव दिखाने को ।
प्राणी को अतीत से जोड़,
फिर पीछे ले जाने को ।
या फिर उसे उत्साह दिला,
कुछ आगे को बढ़ाने को ।
उर की सुप्त चेतना को,
झकझोर कर जगाने को ।
अपनी विचित्र माया से,
मन को भ्रमित बनाने को ।
भूत और वर्तमान में,
एक कड़ी बन जाने को ।
शायद इसीलिये उसको,
भूत की संज्ञा देते हैं ।
प्रयत्न कर कर के ख़ुद को,
दूर बनाये रहते हैं ।
मन को भ्रमित बनाने को ।
भूत और वर्तमान में,
एक कड़ी बन जाने को ।
शायद इसीलिये उसको,
भूत की संज्ञा देते हैं ।
प्रयत्न कर कर के ख़ुद को,
दूर बनाये रहते हैं ।
- सरस्वती जोशी