Wednesday, February 25, 2015

संपत मानता है पिता का अहसान ।

हार्दिक बधाई व शुभ कामनाएँ भैया ! 

संपत मानता है पिता का अहसान । 
पर वह केवल पिता हेतु नहीं जन्मा, 
पिता को लेना है जान ।

उसका क्षेत्र असीम जगत में,
सबसे है उसकी पहचान । 
उसकी कलम हर घर में जाती,
सबको अपना कोई मान । 
दुखिया के आँसू हों या फिर,
होए सुखिया की मुस्कान । 
चाहे हो परम ज्ञान का दाता,
या वह जिसमें भरा हुआ अज्ञान । 
सबके घर में झाँक देख वह,
उनके जीवन को लेता पहचान । 
डाल रोशनी आँख खोलता,
पीर बँटाता रख कर ध्यान ।
इसमें कब दिन ढल जाता है,
इसका उसे नहीं है भान । 
बस पर हित हेतु समर्पित जीवन,
हर पल का करता है दान । 
ईश्वर उसकी कलम को इतनी,
दिव्य शक्ति से युत कर दे । 
के वह हर घर में जा जा कर,
जन-जन की पीड़ा हर ले ! 
- सरस्वती जोशी

कन्या-वध / भ्रूण हत्या

कन्या-वध / भ्रूण हत्या
बेटी, कन्या या नारी के भागय की बात आई तो जग कर्ता तक गया हार ।
उसका जीवन-मरण या भू पर आगमन मानव ने ले लिया हाथ ।
रक्षक कब तक्षक बन डस लें वह यह जान नहीं सकती ।
औ विडंबना यह के इसमें जगकर्ता या भाग्यविधाता तक की है ना इक पल भी चलती ।
सृष्टिकर्ता स्वयं यहाँ अपनी सृष्टि से हार रहा है ।
सोनोग्राफी / ईकोग्राफी के यंत्रों को विवश सा हो निहार रहा है ।
बहुत था अभिमान उसको के वह मानव सी सृष्टि रचा रहा है ।
पर आज विवश सा मानव की करनी को देख अश्रु गिरा रहा है ।
अपना क्रोध प्रकट करने को कई कहर भी ढहाता है ।
पर मानव उनको तक कर नियंत्रित अपने मन की बात चलाता है ।
कन्या-वध जैसा जघन्य कृत्य खुले आम कर आता है ।
औ इक पल को भी मन उसका ज़रा नहीं घबराता है ।
वैसे तो जब भी चाहे जग ईश्वर-ईश्वर चिल्लाता है ।
पर कन्या-वध पातक करने में संकोच नहीं दिखाता है ।
ईश्वर का या नर्क-यातना का भय ना उसे सताता है ।
प्रायश्चित करने को इसका मंदिर तक ना जाता है ।
किसी बोझ या पाप-भावना का भय ना उर में लाता है ।
बस चिकित्सकों को धन्यवाद में कुछ सिक्के ले थमाता है ।
औ ऋण या दंड या कष्ट मुक्त सा हँसता सा घर को आता है ।
बोझ-मुक्त सा मान स्वयं को मन में ग्लानि तक ना लाता है ।
वैसे तो पशु-पक्षी तक की रक्षा की गुहार लगाता है ।
कभी ईश तो कभी नर्क का नाम ले-ले डराता है ।
कन्या-वध या भ्रूण-हत्या की बारी आए तो तनिक नहीं विचलित होता ।
ना कोई अपराध-भावना, ना डर यम का ना धर्मराज का,
ना ही बोझ पाप-कर्म का, निर्भय हो घर में है सोता ।
हे प्रभु ! अब तो इतनी नगण्य औ बेबस है जगती की कन्या या नारी ।
उसके अस्तित्व तक पर आन पड़ी है औ है वह बस बेबस बेचारी ।
क्या उसके रक्षक बन कर हरि ! कोई चमत्कार करोगे ?
क्या इस क्रूरता का हल निकाल तुम कन्या /नारी का बेड़ा पार करोगे ?
हे जग रक्षक ! जग के इस बेबस प्राणी पर कब करुणा का संचार करोगे ?
कब तक मान नगण्य उसे शेष-शैया पर निश्चिंत हो विश्राम करोगे ?
-सरस्वती जोशी

Monday, February 23, 2015

अपनत्व की आस

अपनत्व की आस
बचपन तो बीता गौरी का साधारण से घरबार में ।
पर बाप को थी "खाँत" कि ब्याहे किसी ऊँचे परिवार में ।
आखिर उसने एक बड़ा घर भाग दौड़ कर ढूँढ लिया ।
गदगद हो कर पूरे मन से उसने कन्यादान किया ।
जब फेरे हो ससुराल गई तो माँ ने लंबी लिस्ट थमाई ।
"इन सब से तेरा रिश्ता अब से," कह कर बस दे दी थी विदाई ।
हालाँके स्पष्ट नहीं बोली पर उसकी बात समझ में आई ।
"अब से होगा वह घर तेरा ! बहू वहाँ की ! यहाँ की है तू केवल "जाई" ।"
जाने कैसे वह भूल गई के : बेटी उसकी है "ग़रीब की जाई" ।
बस आनंदित थी सोच-सोच : "बड़े घर में है बेटी ब्याही ।"
औ गौरी पहुँच गयी वहाँ पर भूल कर हर रिश्ता पुराना ।
ध्येय जीवन का उसने बनाया : "बस सबका अपनत्व पाना ।"
मान-अपमान की व्याख्या भूली, सब को मन से अपना मान ।
रिश्ते निभाने के नाम पर ही वह होती रही बार-बार कुर्बान ।
सोचा : कभी तो अपनाएँगे समझ कर हमको भी अपना ।
भूल जग मिथ्या माया जाल, बस है यह एक विचित्र सा सपना ।
स्नेह की लौ जला, अपनत्व की आस में, एक ही ध्येय पर अडिग हो अड़ी रही ।
जब कि सबको कितने ही काम थे, औ गौरी तो नगण्य में भी थी नहीं ।
जिनको पिघलना ही नहीं था, वे तो कभी पिघले नहीं ।
गौरी जिंदगी को निचोड़ कर पूरती रही दिये में कि जलता रहे, बुझ न जाए कहीं !
भूली रिश्ता हरि तक का, पर नादानी नज़र न आई कभी ।
ना सोचा के क्षणभंगुर जीवन इसी में न बीत जाए कहीं !
जब होश में आई, औ सत्य आया समझ में, तो देखा इसी में, उमर बीत गई युँही !
कितने ज़रूरी काम, सब रह गये अधूरे, क्या समय को यूँ खोना था सच में सही ?
जीवन का ध्येय अब तो मालूम था उसे, पर पूरा करने का समय तो बचा ही नहीं !
अब होश भी उसको था चुभता हृदय में, काश सत्य का भान होता ही नहीं !
जा पाती जगत से झूठी ही आस ले कर,जीवन को व्यर्थ खोने का अहसास होता नहीं ।
तसल्ली से आँखें मूँद लेती सदा को, खुद को अंधों सा नासमझ तो पाती नहीं !
विचलित सी हो जाती थी वह, इक प्रश्न पूछता था उसका मन !
अपनत्व की आस में तरसते से दौड़ो, क्या बस इसी को कहते हैं नारी-जीवन ?
सरस्वती जोशी

Sunday, February 22, 2015

उपहार

उपहार
आज चाहते तुमको देना कोई सुंदर सा उपहार ।
यही ढूँढने निकले थे और देख लिया सारा बाज़ार । 
यूँ तो कितनी ही चीजें थीं लगती भी थीं सब अनमोल ।
छाँट रहे थे लोग उन्हें पर अपने नोटों से कुछ तोल ।
हमको उनमें छिपा दिखा कुछ उनके नोटों का अभिमान ।
और लगीं वे सौगातें कुछ फीकी-फीकी औ बेजान ।
तुमको देने लायक हो कुछ ऐसा कुछ भी नहीं मिला ।
हँस करके रख पाएँ आगे हो कुछ ऐसा खिला-खिला ।
जब घर लौटे तो मन भीतर से कुछ थोड़ा हुआ उदास ।
क्या भेजें, कैसे कुछ पाएँ, मिल जाता हमको कुछ काश ।
यही सोचते अपने में ही गहराई में डूब गये ।
और देख कर चमक किसी की विस्मित से हम चौंक गये ।
भीतर कहीं बचे थे बाकी थोड़े से मुस्कानों के कण ।
क्यों न भेज दूँ इन्हें बीन कर लगा पूछने मेरा यह मन ।
पड़े रह गये अगर यहीं तो कभी खार से भर जाएँगे ।
और बनेंगे सभी व्यर्थ ये किसी काम ना आएँगे ।
पर कितने थोड़े हैं ये तो सोच यही होता संकोच ।
पर गर तुम अपने हो तो क्या देखोगे तुम इनका बोझ ?
भेज रहे हैं हम तुमको यह अपना छोटा सा उपहार ।
मान हमें अपना तुम देखो कर लेना इसको स्वीकार !
- सरस्वती जोशी

Wednesday, February 18, 2015

कृतज्ञता या आभार (नेकी कर दरिया में डाल )

कृतज्ञता या आभार (नेकी कर दरिया में डाल )
कितने अजीब हैं इस जगती के नियम !
ईश्वर ने मानव को बना उर में विभिन्न भावों का संचार किया ।
याद रख उनके लाभ-अलाभ, सहने की क्षमता का भी दान किया ।
कितने अद्भुत गुण-प्रतिभा से कर युक्त उसने उसका सम्मान किया ।
पर जाने क्यों एक कमी रख भेजा, जिससे वह मुक्त नहीं हो पाता ।
हर मानव को सदा-सदा ही बस अपना ही दुख नजर है आता ।
दूजे का कष्ट पर्वत से तिनका, ख़ुद का तिनका भी पर्वत बन जाता ।
कोई कितना भी करे त्याग पर अक्सर एक दिवस ऐसा है आता ।
जब मानव हर परोपकार को कर विस्मित मन से दूर भगाता ।
हाँ ! यह सच है के पर के प्रति भावों से भर-भर, हम अपना समय नहीं खो सकते ।
अपने क्षणभंगुर जीवन के पल हम औरों के व्यर्थ नहीं दे सकते ।
पर अकृतज्ञ से बन कर दूरी दिखलाना क्या आवश्यक है ?
आभार भले ना दिखलाएँ पर मुँह छिपाना क्या आवश्यक है ?
लेकिन अक्सर होता यही, और कितने दिल टूट जाते हैं ।
जिनको मन से चाहा हो वे ही दूर चले जाते हैं ।
इसलिये नहीं के उनको आगे किसी हानि का भय लगता हो ।
केवल अतीत का आभार मानो कोई बोझ सा बन जाता हो ।
जैसे कोई हर आभार उन्हें स्मृतियों में आ सताता हो ।
औ मन की शांति हेतु यह करना आवश्यक हो जाता हो ।
अकृतज्ञ ना कहलाने को, दूरी लेना मज़बूरी बन जाता हो ।
जिसने कभी उपकार किया हो वह प्राणी नहीं सुहाता हो ।
अक्सर यही देखते हैं हालाँके सुनने में विचित्र सा लगता है ।
और हर बार हृदय में बरबस ही एक प्रश्न उठ जाता है :
"भलाई-दूरी या बिछोह में क्या कोई अटूट सा नाता है ?"
पर यह सवाल हम खुल कर के तो कभी पूछ ना पाते हैं ।
ओछी सोच वालों की श्रेणी के भय से हम सहसा डर जाते हैं ।
"नेकी कर दरिया में डाल," जैसी कहावतें बनाते हैं ।
कई बार बस मन ही मन अपनी नेकी का शोक मनाते हैं ।
"क्यों की थी हमने वह नेकी ?" यह सोच-सोच पछताते हैं ।
औ फिर इस तुच्छ विचार के कारण ईश्वर से डर जाते हैं ।
"अब न कभी ऐसा सोचेंगे," इसकी कसमें खाते हैं ।
औ अपनी ही उस की नेकी के बोझ तले दब जाते हैं ।
हे ईश्वर ! कैसी माया है तेरी, है यह कितने रंगों वाली !
मानव-मन के भीतर बैठी विचित्र सी सतरंगी जाली !
सरस्वती जोशी

Monday, February 16, 2015

सब जोड़ते जग के रिश्तों को

सब जोड़ते जग के रिश्तों को जाने क्यों लगा दो तरफा आस !
जब बदले में दान नहीं पाते तो अश्रु बहाते हो निराश ।
आवश्यक तो नहीं मिले हर याचक को मन चाहा दान ।
ज्ञात है यह बात फिर भी रखते हैं उर में अरमान ।
जो सच में दो तरफा रिश्ते में करता है पूरा विश्वास ।
उसकी सुध तो नहीं हृदय में हालाँके वह हर पल पास ।
काश केवल देने में ही सुख पाने की सोचे बात ।
बदले में कुछ भी ना पाए तो भी हो ना कभी उदास ।
तो मुक्त हुआ पर निर्भरता से वह पा जाए सुख का भंडार ।
कई कष्ट पल में मिट जाएँ, समझ सके जीवन का सार ।
सरस्वती जोशी