हार्दिक बधाई व शुभ कामनाएँ भैया !
संपत मानता है पिता का अहसान ।
पर वह केवल पिता हेतु नहीं जन्मा,
पिता को लेना है जान ।
उसका क्षेत्र असीम जगत में,
सबसे है उसकी पहचान ।
उसकी कलम हर घर में जाती,
सबको अपना कोई मान ।
दुखिया के आँसू हों या फिर,
होए सुखिया की मुस्कान ।
चाहे हो परम ज्ञान का दाता,
या वह जिसमें भरा हुआ अज्ञान ।
सबके घर में झाँक देख वह,
उनके जीवन को लेता पहचान ।
डाल रोशनी आँख खोलता,
पीर बँटाता रख कर ध्यान ।
इसमें कब दिन ढल जाता है,
इसका उसे नहीं है भान ।
बस पर हित हेतु समर्पित जीवन,
हर पल का करता है दान ।
ईश्वर उसकी कलम को इतनी,
दिव्य शक्ति से युत कर दे ।
के वह हर घर में जा जा कर,
जन-जन की पीड़ा हर ले !
- सरस्वती जोशी
संपत मानता है पिता का अहसान ।
पर वह केवल पिता हेतु नहीं जन्मा,
पिता को लेना है जान ।
उसका क्षेत्र असीम जगत में,
सबसे है उसकी पहचान ।
उसकी कलम हर घर में जाती,
सबको अपना कोई मान ।
दुखिया के आँसू हों या फिर,
होए सुखिया की मुस्कान ।
चाहे हो परम ज्ञान का दाता,
या वह जिसमें भरा हुआ अज्ञान ।
सबके घर में झाँक देख वह,
उनके जीवन को लेता पहचान ।
डाल रोशनी आँख खोलता,
पीर बँटाता रख कर ध्यान ।
इसमें कब दिन ढल जाता है,
इसका उसे नहीं है भान ।
बस पर हित हेतु समर्पित जीवन,
हर पल का करता है दान ।
ईश्वर उसकी कलम को इतनी,
दिव्य शक्ति से युत कर दे ।
के वह हर घर में जा जा कर,
जन-जन की पीड़ा हर ले !
- सरस्वती जोशी