विपरीतता की मित्रता
धूप-छाँव, दिन औ रात, मिलन-विरह औ सुख-दुखादि सब हैं कितने विपरीत !
फिरभी कहते हैं : "इनके जोड़े हैं, है इनमें आपस में प्रीत !
स्नेह भाव रखते आपस में इक दूजे का साथ निभाते ।
इक दूजे का मान बढ़ाने की खातिर ही ख़ुद हैं मिट जाते ।"
फिरभी कहते हैं : "इनके जोड़े हैं, है इनमें आपस में प्रीत !
स्नेह भाव रखते आपस में इक दूजे का साथ निभाते ।
इक दूजे का मान बढ़ाने की खातिर ही ख़ुद हैं मिट जाते ।"
यह विपरीतता की मित्रता हम कभी ना समझ पाये !
ये भोर और संझा के साये, इनमें कितने रंग समाये ।
प्रभात की लाली से निकलते बाल सूर्य की सुस्मित किरणें ।
उनकेअंतर में पलते कितने मीठे-मीठे सपने ।
ये भोर और संझा के साये, इनमें कितने रंग समाये ।
प्रभात की लाली से निकलते बाल सूर्य की सुस्मित किरणें ।
उनकेअंतर में पलते कितने मीठे-मीठे सपने ।
खिलती कलियों का मधुर हास । पवन से उनका हास-विलास ।
कड़ी धूप का उष्ण ताप । मुरझाने का उर में संताप ।
मन में छिपे ढेरों अरमान । जो पूरे हुए उनका अभिमान ।
अधूरों को पूरा करने का प्रयास । अस्ताचल को जाते सूरज का त्रास ।
कड़ी धूप का उष्ण ताप । मुरझाने का उर में संताप ।
मन में छिपे ढेरों अरमान । जो पूरे हुए उनका अभिमान ।
अधूरों को पूरा करने का प्रयास । अस्ताचल को जाते सूरज का त्रास ।
धिर आगे बढ़ता यह अंधकार । जिसमें सिमटेगा यह संसार ।
बस एक किरण करती शक्ति संचार । फिर आयेगी प्रभात की बयार ।
पुन: आयेगा खिलता वसंत । होगा इस पतझर का अंत ।
वही मुरझाया फूल नया बन खिलेगा । उसे उसका सौरभ फिरसे मिलेगा ।
बस एक किरण करती शक्ति संचार । फिर आयेगी प्रभात की बयार ।
पुन: आयेगा खिलता वसंत । होगा इस पतझर का अंत ।
वही मुरझाया फूल नया बन खिलेगा । उसे उसका सौरभ फिरसे मिलेगा ।
कभी प्रात आता ले सुखद सी बयार ! कभी डूब जाता सूरज करके अंधकार !
पतझर की कृपा से सुहाता वसंत ! जन्म को महत्व दिलाता है अंत !
पर समझ में न आता जो फिरसे था देना । तो क्यों था ज़रूरी जो था उसको लेना ।
कहते हैं यही है प्रभु की माया का खेल । कभी कराती विरह, कभी होता मेल ।
पतझर की कृपा से सुहाता वसंत ! जन्म को महत्व दिलाता है अंत !
पर समझ में न आता जो फिरसे था देना । तो क्यों था ज़रूरी जो था उसको लेना ।
कहते हैं यही है प्रभु की माया का खेल । कभी कराती विरह, कभी होता मेल ।
सरस्वती जोशी