Tuesday, January 6, 2015

विपरीतता की मित्रता

विपरीतता की मित्रता
धूप-छाँव, दिन औ रात, मिलन-विरह औ सुख-दुखादि सब हैं कितने विपरीत !
फिरभी कहते हैं : "इनके जोड़े हैं, है इनमें आपस में प्रीत !
स्नेह भाव रखते आपस में इक दूजे का साथ निभाते ।
इक दूजे का मान बढ़ाने की खातिर ही ख़ुद हैं मिट जाते ।"
यह विपरीतता की मित्रता हम कभी ना समझ पाये !
ये भोर और संझा के साये, इनमें कितने रंग समाये ।
प्रभात की लाली से निकलते बाल सूर्य की सुस्मित किरणें ।
उनकेअंतर में पलते कितने मीठे-मीठे सपने ।
खिलती कलियों का मधुर हास । पवन से उनका हास-विलास ।
कड़ी धूप का उष्ण ताप । मुरझाने का उर में संताप ।
मन में छिपे ढेरों अरमान । जो पूरे हुए उनका अभिमान ।
अधूरों को पूरा करने का प्रयास । अस्ताचल को जाते सूरज का त्रास ।
धिर आगे बढ़ता यह अंधकार । जिसमें सिमटेगा यह संसार ।
बस एक किरण करती शक्ति संचार । फिर आयेगी प्रभात की बयार ।
पुन: आयेगा खिलता वसंत । होगा इस पतझर का अंत ।
वही मुरझाया फूल नया बन खिलेगा । उसे उसका सौरभ फिरसे मिलेगा ।
कभी प्रात आता ले सुखद सी बयार ! कभी डूब जाता सूरज करके अंधकार !
पतझर की कृपा से सुहाता वसंत ! जन्म को महत्व दिलाता है अंत !
पर समझ में न आता जो फिरसे था देना । तो क्यों था ज़रूरी जो था उसको लेना ।
कहते हैं यही है प्रभु की माया का खेल । कभी कराती विरह, कभी होता मेल ।
सरस्वती जोशी

Monday, January 5, 2015

वे नव वर्ष के प्रतीक्षा भरे पल

वे नव वर्ष के प्रतीक्षा भरे पल
हर जाती साँस के साथ, हर आती आस के साथ,
हमने किया था इंतज़ार ! हाँ ! हमने किया था बहुत इंतज़ार !
तरसती निगाहों से फोन की ओर देखा था बार-बार !
हर मुबारकवाद को आती घंटी मानो कर रही थी हृदय पर प्रहार !
पूछ रहा था मन : "क्यों जीवन में ऐसे गये हम हार ?"
हर आता शुभ संदेश भी फीका सा लग रहा था ।
मन में तुम्हारा स्वर सुनने का अरमान जग रहा था ।
कितने ही संदेश आये, पर कोई मन को न भा रहा था !
हालाँके वह हर बार शुभ कामना ही ला रहा था ।
लेकिन हुई नहीं पूरी हमारी उम्मीदों की फरियाद !
तुमको नही करना था, तो नही ही किया हमको याद ।
ज्ञात है हमको कि यह है घर-घर की कहनी ।
इस क्षणभंगुर से जीवन में होती नहीं हर घड़ी सुहानी !
सबसे निकटस्थ ही सबसे पहले दूरी ले लेते हैं ।
बहुत चाहने पर भी अक्सर स्नेह घटा ही देते हैं ।
फिर भी आँचल पर आँखों से कुछ बूँदें गिरने ही लगीं ।
ज्ञान के हर रंग को फीका सा करने ही लगीं ।
उर में अतीत की जाने कितनी स्मृतियाँ उभरने सी लगीं ।
मन डूब गया उनमें और रात फिसलने सी लगी !
एक के बाद एक कितने परत खुलते ही रहे ।
नव वर्ष की रात के सब रंग घुलते ही रहे ।
यह तो नहीं कह पाएँगे कि : "वे सारे बीते थे उदास,"
हालाँके साथ में हर बार निकली थी इक गहरी उसाँस ।
लेकिन हम बीच-बीच में कई बार मुस्कुराये !
अतीत के कितने ही वसंत मानो इस बगिया में खिल आये ।
यूँही जाने कब, गीले आँचल में ही, हम नींद में सो गये ।
और तुम से ही जुड़े सुंदर से सपनों में खो गये !
बहुत सुहाने कोमल से थे वे सारे ही प्यारे सपने !
मेरी ममता की छाया में, बैठे थे तुम बन कर अपने ।
पर जगती की माया ने उनको टिकने नहीं दिया !
नव वर्ष की रात बीत गई औ दिन निकल ही गया ।
देखा : नव-वर्ष की तो कई घड़ियाँ गईं निकल !
मन बोला : "उठ ! कर्म पर लग, भूल रात का हर पल ।
अब कुछ भी नया नहीं, न कोई संदेश आयगा ।
न अब कोई तुम्हें मुबारक़वाद भिजायेगा ।"
तब से हम भी औरों की तरह खुद को समझाने में लगे हैं ।
जीवन का सत्य समझ, ख़ुद को मज़बूत बनाने में लगे हैं ।
अब न मन अशांत, न ही कोई इंतज़ार !
"मरुथल में न आता वसंत," दोहरा लेते हैं बार-बार !
सरस्वती जोशी